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भूत बंगला: पुरानी जादू को फिर जगाने की एक नयी प्रयास

भूत बंगला: पुरानी जादू को फिर जगाने की एक नयी प्रयास

भूत बंगला फिल्म रिव्यू – अक्षय कुमार, तब्बू और प्रियदर्शन की हॉरर-कॉमेडी में हास्य और डर का अनोखा मेल। क्या यह भूल भुलैया की याद ताजा कर पाई? पूरी समीक्षा, प्लॉट, परफॉर्मेंस और कमियां पढ़ें। 17 अप्रैल 2026 रिलीज हुई यह मूवी|

भूत बंगला: पुरानी जादू को फिर जगाने की एक नयी कोशिश

प्रियदर्शन और अक्षय कुमार की जोड़ी सालों बाद एक बार फिर स्क्रीन पर लौटी है। उनकी नई फिल्म “भूत बंगला” डर और हंसी को मिलाकर दर्शकों को थिएटर में बांधने की कोशिश करती है। यह फिल्म भूल भुलैया फ्रेंचाइजी की याद दिलाती है, जिसे बाद में अनीस बज्मी और कार्तिक आर्यन ने आगे बढ़ाया। लेकिन इस बार कहानी में नई बातें कम हैं और पुरानी स्टाइल ज्यादा दिखती है।

फिल्म 17 अप्रैल 2026 को रिलीज हुई है। इसका रनटाइम करीब 150-164 मिनट है। इसमें अक्षय कुमार के साथ तब्बू, वामिका गब्बी, मिथिला पालकर, परेश रावल, राजपाल यादव, जिशु सेनगुप्ता, असरानी और राजेश शर्मा जैसे कलाकार हैं। यह गर्मियों की छुट्टियों के लिए फैमिली एंटरटेनमेंट के रूप में पेश की गई है।

कहानी का सार

कहानी का सार

कहानी का सार, अक्षय कुमार और राजपाल यादव की यह फिल्म दर्शको में मनोरंजन बढ़ाएगी

अर्जुन आचार्य (अक्षय कुमार) को अपने दादा का पुराना भव्य महल विरासत में मिलता है। यह महल मंगलपुर गांव में है और स्थानीय लोग इसे भूतिया मानते हैं। महल पर एक पुराना श्राप है, जो दुल्हनों को निशाना बनाता है।

अर्जुन कर्ज चुकाने और अपनी बहन की शादी करने के लिए महल का इस्तेमाल करना चाहता है। वह स्थानीय लोगों की चेतावनियों को अनसुना कर देता है। इसके बाद अजीब-अजीब अलौकिक घटनाएं शुरू हो जाती हैं। फिल्म में काला जादू, पुरानी किंवदंतियां और विश्वासघात की कहानी भी घुली हुई है।

पहला हिस्सा ज्यादा हास्य पर आधारित है, जबकि दूसरा हिस्सा भावनात्मक रहस्य और डर की तरफ मुड़ता है। पटकथा रोहन शंकर और अभिलाष नायर ने लिखी है।

 पॉइंट्स: कहां चमकती है यह फिल्म?

  • अक्षय कुमार की उर्जा : अक्षय अपनी पुरानी स्टाइल में भोलेपन, शारीरिक कॉमेडी और साहसिक किरदार निभाते हैं। उनकी ऊर्जा फिल्म को आगे बढ़ाती है। कई दृश्यों में वे दर्शकों को हंसाने में सफल रहते हैं।
  • साइड एक्टर्स का धमाल : राजपाल यादव अपनी जोशीली हास्य शैली से स्क्रिप्ट की कमियों को भी ढक देते हैं। परेश रावल और दिवंगत असरानी (शायद उनकी आखिरी फिल्म) परिस्थितिजन्य कॉमेडी में अच्छा प्रयास करते हैं।
  • डर और हास्य का मिश्रण: कुछ दृश्य अच्छे डरावने हैं और कुछ चुटकुले हंसाते हैं। प्रियदर्शन की दिग्गज शैली यहां दिखती है।
  • दूसरा हिस्सा: भावनात्मक गहराई और रहस्य दर्शकों को बांधता है।

पॉइंट्स: मूवी की कमिया

फिल्म की सबसे बड़ी समस्या मौलिकता की कमी है। कहानी काफी हद तक पुरानी और घिसी-पिटी लगती है। पहले हिस्से में चुटकुले बेतरतीब हैं और एक सुसंगत कहानी की जगह जबरदस्ती जोड़े गए महसूस होते हैं।

कई चुटकुले लैंगिक भेदभाव और शौचालय वाले विषयों पर आधारित हैं, जो आज के समय में अप्रिय लग सकते हैं। संवादों में भी छोटी-छोटी गलतियां हैं, जैसे दक्षिणा और बख्शीश में भ्रम।

अक्षय कुमार कई जगह खुद को दोहराते नजर आते हैं। फिल्म 150 मिनट से ज्यादा लंबी है, जिससे बीच में बोरियत हो सकती है। जबरदस्ती पुरानी यादें जगाने की कोशिश भी महसूस होती है।

परफॉर्मेंस का अनुमान

अक्षय कुमार अपनी अपार ऊर्जा से फिल्म संभालते हैं, लेकिन नया कुछ नहीं लाते। तब्बू और वामिका गब्बी अपने किरदारों में फिट बैठती हैं। परेश रावल और राजपाल यादव हंसी के मुख्य स्रोत हैं। असरानी की मौजूदगी नॉस्टेल्जिया देती है।

अंतिम पड़ाव

“भूत बंगला” उन दर्शकों के लिए अच्छा विकल्प है जो पुरानी स्टाइल की हॉरर-कॉमेडी पसंद करते हैं। इसमें हंसी और डर दोनों हैं, लेकिन स्क्रिप्ट में मौलिकता और ताजगी की कमी खलती है। अगर आप गर्मियों की छुट्टी में फैमिली के साथ हल्का-फुल्का मनोरंजन चाहते हैं तो एक बार देख सकते हैं।

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