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माता लक्ष्मी का वास्तविक स्वरूप: केवल धन ही नहीं, सुख-समृद्धि और विवेक की देवी

माता लक्ष्मी हिंदू धर्म के अनुसार धन , वैभव, ज्ञान, सौभाग्य और समृद्धि की देवी मानी जाती है। वे भगवान विष्णु की अर्धांगिनी है और सृष्टि के पालन में उनका विशेष योगदान है। शास्त्रों के अनुसार माता पद्मा का उद्भव देवी आदि परा शक्ति से हुआ था, जिससे यह सिंह होता है कि वह केवल धन की ही नहीं बल्कि चेतना और सकारात्मक ऊर्जा की भी प्रतीक है।

समुद्र मंथन के समय निकल 14 रतन में से माता पद्मा का प्राकट्य हुआ, जिसे देवताओं और समस्त ब्रह्मांड के लिए अत्यंत शुभ माना गया। जहां माता लक्ष्मी का वास होता है वहां केवल धन ही नहीं, बल्कि धर्म, सदाचार, शांति और सुख समृद्धि भी अपने आप आ जाती है। इसी कारण उन्हें केवल भौतिक संपत्ति की देवी ना मानकर जीवन को संतुलित और पवित्र बनाने वाली करुणामई माता के रूप में पूजा जाता है।

लक्ष्मी

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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, “श्री” सांसारिक क्षेत्र में मातृभूमि के रूप में पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करता है, जिसे हम श्रद्धापूर्वक पृथ्वी माता कहते है। इसी कारण माता पद्मा को पृथ्वी की उर्वरता, पोषण और स्थिरता से जोड़ा जाता है शास्त्रों में उन्हें भू देवी और श्रीदेवी के रूप में भी अपनाया गया है, जिन्हें माता पद्मा के ही दिव्या अवतार माना जाता है। इस रूप में माता लक्ष्मी न केवल भौतिक समृद्धि प्रदान करने वाली देवी हैं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड को धारण और पोषण करने वाले मातृशक्ति के रूप में भी पूजित होती हैं।

पद्मा का महत्व केवल हिंदू धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि जैन और बौद्ध धर्म में भी उनका विशेष स्थान माना गया है। जैन धर्म में लक्ष्मी को एक महत्वपूर्ण देवी के रूप में अपनाया गया है और अनेक जैन मंदिरों में उनकी मूर्तियां देखने को मिलती है, जहां वे समृद्धि, सौभाग्य और ग्रस्त जीवन की स्थिरता का प्रतीक मानी जाती हैं।

इस प्रकार बौद्ध परंपरा में भी लक्ष्मी को प्रचुरता, शुभ भाग्य और ऐश्वर्या की देवी के रूप में सम्मान प्राप्त है। इतिहास में उनके स्वरूप को बौद्ध धर्म के सबसे प्राचीन जीवित स्तूपों और गुफा मंदिरों में अंकित किया गया है, जया दर्शाता है की पद्मा अवधारणा भारतीय धार्मिक परंपराओं में कितनी व्यापक और प्राचीन रही है।धन, सद्बुद्धि और लक्ष्मी का वास्तविक स्वरूप  का अधिक मात्रा मे एकाकृत हो जाना मात्र किसी व्यक्ति को सौभाग्यशाली नहीं बनाता।

यदि धन के साथ सद्बुद्धि और विवेक का अभाव हो, तू वही धन नशे के समान कार्य करने लगता है, जो मनुष्य को धीरे-धीरे अहंकारी, उद्धत, आलसी और दुर्व्यवहार की ओर ले जाता है। समानता देखा गया है कि धान की प्राप्ति के बाद अनेक लोग कंजूस, फिजूलखर्ची, आलीशानोंपन और अहंकार से ग्रस्त हो जाते हैं।

शास्त्रों में माता लक्ष्मी का एक वाहन ओउल उल्लू माना गया है, जो मूर्खता और अविवेक का प्रतीक है। इसका यह आश्चर्य है कि कुसंस्कारों से युक्त व्यक्ति के हाथों में आई अनावश्यक संपत्ति उसे विवेकशील नहीं, बल्कि मूर्ख ही बना देती है। ऐसे लोग धन का सदुपयोग करने के स्थान पर उसका दुरुपयोग करते है और अंततः उसी के दुष्परिणामों से स्वयं को छिन भिन्न कर जाते हैं।

माता लक्ष्मी का स्वरूप

माता लक्ष्मी के अनेक दिव्य रूप माने गए हैं, जिनमें उनके आठ प्रमुख स्वरूप विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जिन्हें अष्ट लक्ष्मी कहा जाता है। यह ऑथर ऑफ जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समृद्धि, शक्ति और संतुलन का प्रतीक है। देवी लक्ष्मी का अभिषेक दो हाथियों द्वारा किया जाता है, जो राजसत्ता ऐश्वर्या और पवित्रता का संकेत देता है। वह कमाल के आसन पर विराजमान होती हैं, जहां कमल कोमलता पवित्रता और निर्मलता का प्रतीक माना गया है।

माता पद्मा का एक मुख्य और चार भुजाएं होती हैं, जो एक लक्ष्य और चार प्रकृतियों दूरदर्शिता, दृढ़संकल्प, संघर्ष तथा व्यवस्था शक्ति का प्रतीक है। उनके दो हाथों में सुशोभित कमल सुंदरता, शुद्धता और प्रमाणिकता का याद दिलाते है। एक हाथ की दान मुद्रा उदारता और परोपकार का संदेश देती है, जबकि आशीर्वाद मुद्रा से अभय और अनुग्रह का भाव प्रकट होता है।

माता पद्मा का वाहन उल्लू निर्भीकता, सजकता तथा अधिकार में भी सत्य और विवेक से देखने की क्षमता का प्रतीक माना गया है, इस प्रकार माता पद्मा का संपूर्ण स्वरूप केवल भौतिक धन ही नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण, संतुलित और धर्म युक्त जीवन की प्रेरणा देता है।

कोमलता और सुंदरता सदैव सुव्यवस्था में ही सल्लग्न रहती है। जब किसी कार्य, वस्तु या संपदा का उपयोग नीति, न्याय और संतुलन के साथ किया जाता है, तभी वह वास्तविक सौंदर्य को प्राप्त करता है। इसी सुव्यवस्थित सद्प्रवृती को कला कहा जाता है। माता पद्मा का एक नाम कमल भी है, और इसी कमल तत्व को संक्षेप में कल के रूप में समझ गया है।

वस्तुओं और संपदा को सुनियोजित रीति से उद्देश्य के लिए उपयोग करना, उन्हें परिश्रम, मनोयोग और ईमानदारी से, नीति और न्याय की मर्यादा में रहकर अर्जित करना भी अर्थ कला के अंतर्गत आता है। उपार्जन और अभिवर्धन में कुशल होना श्री तत्व के अनुग्रह का प्रथम चरण माना गया है।

इसका मतलब यह है कि अर्जित धन एक एक अंश विवेक पूर्वक, बिना किसी अपव्यव के, केवल शुभ और सार्थक परियोजना में ही इस्तेमाल किया जाए। इसी प्रकार धन का संयमित और सदुपयोग ही पद्मा कृपा का वास्तविक प्रमाण है।

माता पद्मा का जल अभिषेक करने वाले दो गजराज परिश्रम और मनोयोग के प्रतीक माने जाते हैं। इन दोनों का लक्ष्मी से अत्यंत और गहन संबंध है, क्योंकि जहां परिश्रम के साथ मनोयोग जुड़ जाता है, वहां वैभव, श्रेय और सहयोग की कभी कमी नहीं रहती। यह दिव्या युग में जिस स्थान पर विद्यमान होता है, वहां समृद्धि स्वत आकर्षित होती है।

प्रतिभा और क्षमता से संपन्न व्यक्ति पर सफलता की वर्षा होती है तथा जीवन में उन्नति और उत्कर्ष के अवसर उन्हें पग पग पर प्राप्त होते रहते हैं। इस प्रकार या प्रतीक हमें यह सिखाता है की सच्ची लक्ष्मी केवल सौभाग्य से नहीं, बल्कि निरंतर श्रम और एकाग्र प्रयास से प्राप्त होती है।

गायत्री साधना, श्री तत्त्व और लक्ष्मी की कृपा

गायत्री के तत्व दर्शन एवं साधना कम की एक महत्वपूर्ण धारा लक्ष्मी से संबंधित मानी जाती हैं। इसका मूल शिक्षक यह है कि यदि व्यक्ति अपने भीतर कुशलता, योग्यता और कार्य क्षमता की निरंतर प्रयास करता रहे, तो वह जहां भी रहेगा, वहां महालक्ष्मी के अनुग्रह और अनुदान की कभी कमी नहीं होगी। गायत्री उपासना की एक विशेष धारा को “श्री साधना कहा गया है”।

इस साधना के विधान को अपने से चेतना केंद्र में लुप्त पड़ी वह आंतरिक शक्तियां जाग्रत होने लगती हैं, जिनके चुंबकीय आकर्षण से धन और वैभव उचित मात्रा में, सहज रूप से जीवन में एकत्रित होता रहता है।

जब यह धन संपदा एकत्र होती है, तब बुद्धि की देवी सरस्वती उसका केवल संचय नहीं होने देती, बल्कि उसे परमार्थ लोक कल्याण और सब परियोजनाओं में लगाने की प्रेरणा प्रदान करती हैं। इस प्रकार लक्ष्मी और सरस्वती का समन्वय जीवन को संतुलित, सार्थक और धर्म युक्त बनता है। देवी महालक्ष्मी के इस गुण और प्रेरक स्वरूप को समझने के लिए पुस्तक “महालक्ष्मी के आत्मकथा” निहार, शतपथि, राज मंगल प्रकाशन 2020 मैं छापी गई है जो एक महत्वपूर्ण और विचार उत्तेजक ग्रंथ मानी जाती है।

फलदायिनी

माता पद्मा प्रसन्नता, लास्ट और विनोद की देवी मानी जाती है। जहां उनका वास होता है, वहां हंसी-खुशी और सकारात्मक का वातावरण स्वाभाविक रूप से बना रहता है। अस्वक्षता भी दरिद्रता का एक रूप है, जबकि सौंदर्य, स्वच्छता, प्रसन्नता, सुव्यवस्था, और श्रमनिष्ठा और कार्यक्षमता व धर्मनिष्ठता का वातावरण विकसित होता है। गायत्री की पद्मा धारा का आवाहन करने वाले व्यक्ति श्रीवान बनते हैं।

वे लक्ष्मी के आनंद को केवल अपने तक सीमित नहीं रखते हैं, बल्कि उसका लाभ समाज के जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाते हैं। इस प्रकार महालक्ष्मी केवल व्यक्तिगत ऐश्वर्या की नहीं, बल्कि सामूहिक कल्याण की प्रेरक शक्ति भी हैं। महालक्ष्मी के स्वरूप, उनके वहां और उनसे जुड़े प्रति का यह संक्षिप्त विवेचन हमें यह समझता है की सच्ची, समृद्धि, प्रसन्नता, स्वच्छता , संयम और परोपकार से भी हम माता लक्ष्मी को प्रसन्न कर सकते हैं।

माता लक्ष्मी के अनेक नाम

माता पद्मा के अनेक नाम है, जिनमें कुछ प्रसिद्ध और प्रचलित है जैसे — श्री, पद्मा, कमला,, चंचला, महालक्ष्मी , हरिप्रिया, लोकमता वैष्णवी आदि नामों से जाना जाता है।

श्री हरि —लक्ष्मी नारायण। विवाह

महर्षि दुर्वासा के श्राप को सक्रिय करने के लिए एक समय माता महालक्ष्मी ने इस संसार का त्याग कर समुद्र में निवास करना स्वीकार किया। उनके पृथ्वी से अंतर्धान होते ही देवताओं का तेज, ऐश्वर्या और सामर्थ्य छिन्न भिन्न होने लगा। तब देवताओं ने माता लक्ष्मी की पुनः प्राप्ति तथा अमृत के लिए भगवान विष्णु के मार्गदर्शन में समुद्र मंथन का महान कार्य प्रारंभ किया।

शरद पूर्णिमा के पावन दिन समुद्र मंथन से माता श्री लक्ष्मी पुनः प्रकट हुई और उनके प्रकट से संपूर्ण सृष्टि में फिर से सौभाग्य, समृद्धि और आनंद का संचार हुआ। इसी शुभ तिथि को माता पद्मा ने भगवान विष्णु से पुनः विवाह किया। यही कारण है कि शरद पूर्णिमा को पद्मा प्रकट और लक्ष्मी विष्णु के दिव्य मिलन का पर्व माना जाता है, जो जीवन में समृद्धि, प्रेम और संतुलन का संदेश देता है।

माता लक्ष्मी की प्रसिद्ध राशियां

माता पद्मा को कई राशियां प्रिय है, जिनमें वृषभ, कर्क, सिंह, तुला और वृश्चिक प्रमुख है, क्योंकि इन राशियों के स्वामी ग्रह (शुक्र,चंद्रमा, सूर्य, शनि) धन, वैभव , सुख और भाग्य से जुड़े है, जिससे इन राशियों के जातकों पर मां लक्ष्मी की विशेष कृपा रहती है और उन्हें धन संपत्ति तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

माता लक्ष्मी के प्रसिद्ध मंदिर

हां, माता पद्मा के भारत में कई प्रसिद्ध मंदिर हैं, जिनमें मुंबई का महालक्ष्मी मंदिर, दिल्ली का लक्ष्मी नारायण मंदिर (बिड़ला मंदिर), कोल्हापुर का महालक्ष्मी मंदिर , चेन्नई का अष्टलक्ष्मी मंदिर और तिरुपति के पास पद्मावती अम्मावरी मंदिर प्रमुख है, जहां धन और समृद्धि के लिए भक्त दर्शन करने आते है। महालक्ष्मी मंदिर, रतलाम (मध्य प्रदेश) यह अपने अनोखे प्रसाद के लिए प्रसिद्ध है, जहां भक्तों को। सोने चांदी के गहने और सिक्के प्रसाद के रूप में दिए जाते है।

निष्कर्ष

माता पद्मा शुक्रवार को पूजने वाली देवी है, ये सिर्फ धन का ही नहीं, बल्कि ज्ञान, प्रकाश, और सुख समृद्धि की देवी व माता है। माता लक्ष्मी समुद्र मंथन के दौरान उन रत्नों में से पुनः जन्मी थीं इनका प्राकट्य बहुत ही अतुलनीय और पूजनीय है। माता महालक्ष्मी श्री हरि नारायण की अर्धांगिनी भी है।

सारांश

इस लेख में माता महालक्ष्मी का वर्णन बहुत ही सरल शब्दों में किया गया है, जो इस लेख को बहुत ही रोचक और दिलचस्प बनाता है। और आपको पढ़ने में आसानी के साथ जानकारी पूर्ण शब्दों में रोमांचित करे।

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