भगवान गणेश हिन्दू धर्म के सबसे प्रिय और पूज्य देवताओं में से एक है। उन्हें विघ्नहर्ता, सिद्धिविनायक, गणपति, और लम्बोदर जैसे अनेक नामों से जाना जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरूआत से पहले गणेश जी की पूजा अर्चना करना अनिवार्य माना जाता है, ताकि वे कार्य में आने वाली बाधाओं को हर कर सफलता की ओर बढ़ाए।
गणेश जी का स्वरूप अत्यंत अदभुत और प्रतीकात्मक है। हाथी का मस्तक विशाल बुद्धि और विवेक का प्रतीक है, बड़े कान सीखते है कि हमें अधिक सुनना चाहिए , छोटी आंखे एकाग्रता का संदेश देती है और लम्बी सूंड़ल प्राकृतिकरण शक्ति को दर्शाती है। उनका मोटा पेट यह बताता है कि जीवन के सुख– दुख दोनों को समान भाव से स्वीकार करना चाहिए।
जन्म और इतिहास

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भगवान गणेश का जन्म एक अत्यंत भावुक प्रेरणादायक कथा से जुड़ा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने स्नान के समय अपने शरीर के उबटन से एक सुंदर बालक की रचना की और उसमें प्राण डालें। उन्होंने उस बालक को आदेश दिया कि जब तक वह स्नान कर रही हो, कोई भीतर न आने पाए।
इसी आज्ञा का पालन कर वह बालक ब्रह्मांड के सभी प्रतिष्ठित देवताओं, शिव गढ़ों आदि से युद्ध किया क्योंकि वे सभी देवता और शिवगण माता पार्वती से मिलने आए थे, परंतु माता का ही आदेश था कि कोई भी स्नान करते समय अंदर न आ पाए , सभी देवता गणेश जी से हार गए अंत में स्वयं भगवान शंकर आए परंतु गणेश ने उन्हें भी भीतर जाने से रोक दिया, तभी शिव जी क्रोधित होकर उस बालक पर त्रिशूल का प्रहार कर गला काट दिया।
जब माता पार्वती को यह ज्ञात हुआ, तो वे अत्यंत दुखी हुई और सृष्टि को नष्ट करने को महाकाली का रूप धारण कर लिया। तब शिवजी ने अपने घरों को भेज कर उसे जीव का सर लाने को कहा, जिसकी दिशा उत्तर की ओर हो। सबसे पहले उन्हें हाथी का सिर मिला, जिसे महादेव ने बालक के धड़ से जोड़ दिया, इस प्रकार गणेश हाथी मस्तक वाले देवता बन गए।
महादेव ने उन्हें वरदान दिया कि वह गणों के अधिपति, विघ्नों का नाश करने वाले और प्रथम पूज्य कहलाएंगे। तभी से किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेश पूजन की परंपरा हमारी संस्कृति से जुड़ गई और आगे बढ़ने वाले दिशा में आकर्षित हो गई।
इतिहास की दृष्टि से गणेश पूजा भारत में अत्यंत प्राचीन है। वैदिक काल से लेकर पुराने तक उनका उल्लेख मिलता है। समय के साथ गणेश जी लोक देवता से लेकर सर्वमान्य आराध्या बने, उनकी भक्ति में शक्ति के साथ-साथ बुद्धि, धैर्य और विनम्रता, शक्ति का भाव समाहित है।
गणेश जी के अवतार
गणेश युग और समय के साथ ब्रह्मांड में अवतार लेते रहे।
1. सतयुग: महोत्कट विनायक
जब दुनिया एकदम नई थी, तब गणेश जी कश्यप ऋषि और अदिति के घर बेटे बनकर जन्मे।
. सवारी— सिंह यानी शेर
. छवि — 10 भुजाएं थी
.उद्देश्य— देवांतक और निरंतक जैसे भारी भरकम असुरों को मारना था। उस समय उन्हें “महोत्कट” कहा जाता था।
2. त्रेतायुग:
त्रेतायुग में गणेश जी ने पुनः अवतार लिया।
. सवारी— मोर
. छवि — छह भुजाएं थी और बेहद सुंदर दिखते थे।
. उद्देश्य— सिंधु नाम के असुर का अहंकार को चूर्ण करना और हराना था
3. द्वापरयुग: “गजानन”
यह वही अवतार है जिन्हें हम आज सबसे ज्यादा जानते है और पूजते हैं। द्वापरयुग में वे फिर से महादेव के पुत्र रूप में आए।
.सवारी— मूषक (चूहा)
. छबि — चार भुजाएं और प्यारा सा हाथी वाला मुख, जिसे कहते हैं गजानन।
. उद्देश्य — “सिंधुरासुर” नाम के दैत्य को खत्म करना। आज हर घरों में बप्पा के इसी रूप की पूजा होती है।
4. कलियुग: धूम्रकेतु
यह अवतार अभी आना बाकी है! जैसे विष्णु जी के “कल्कि” अवतार की चर्चा होती है, वैसे ही गजानन जी “धूम्रकेतु” बनकर आयेंगे और राक्षसों का विनाश करेंगे।
. वाहन: नीला घोड़ा
.छबि: रंग धुएं जैसा होगा।
. उद्देश्य: पृथ्वी के आतंक को खत्म करना।
गणेश भगवान की प्रथम पूजा क्यों होती है?

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एक बार देवताओं में धरती की परिक्रमा की प्रतियोगिता हुई। प्रतियोगिता क्यों हुई थी आईए जानते हैं? देवताओं में एक दूसरे से बहस चल रही थी, कि मैं सर्वश्रेष्ठ हूं इस हल का निवारण करने के लिए प्रतियोगिता रखी गई, प्रतियोगिता का नियम था जो कोई भी धरती की परिक्रमा करके पहले लौटेगा वहीं विजेता होगा। सभी देव अपने-अपने वाहनों से निकल पड़े, लेकिन भगवान गजानन का वाहन मूषक चूहा था और उसकी गति बहुत धीमी थी।
तब गणेश जी ने अपनी बुद्धि का प्रयोग किया, उन्होंने धरती की परिक्रमा करने के बजाय अपने माता-पिता भगवान शिव और माता पार्वती की परिक्रमा कर ली। उन्होंने कहा कि माता-पिता ही पूरा संसार और ब्रह्मांड है इसलिए उनकी परिक्रमा करना पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा करने के समान है। भगवान गजानन के इस बुद्धिमानी से सभी देवता प्रसन्न हुए, ब्रह्मा जी की सिफारिश और देवताओं की सहमति से गजानन जी को प्रथम पूज्य यानी अग्रपूज्य देव माना गया इसी कारण पंचदेव उपासना में भी भगवान गणेश का विशेष स्थान है।
गणेश जी को क्या पसंद है?
भगवान गणेश को बहुत सी चीजें प्रिय हैं। किंतु उन्हें मोदक और लड्डू बहुत पसंद है, इसलिए पूजा में यही भोग चढ़ाया जाता है। उन्हें लाल रंग के फूल विशेष प्रिय होते हैं, दूब घास (दूर्वा) उन्हें जल्दी प्रसन्न करती है। शमी के पत्ते, केल और केला भी गणेश जी को चढ़ाया जाता है। पूजा के समय केसरिया चंदन, अक्षत, और दूर्वा चढ़ाकर कपूर जलाकर आरती की जाती है।
गणेश जी का प्रतीक और उनका महत्व
गणेश जी का बड़ा पेट यह सिखाता है कि हमें हर बात को खुले दिल से स्वीकार करना चाहिए और उधर बनना चाहिए, उनके ऊपर उठा हुआ हाथ सुरक्षा का संकेत है मानव वह कह रहे हैं “डरो मत मैं तुम्हारे साथ हूं” उनका झुका हुआ हाथ, जिसकी हथेली बाहर की ओर होती है, दान और करुणा का प्रतीक है। यह हमें विनम्र बने और यह याद दिलाने का पैगाम देता है कि एक दिन हम सब इसी मिट्टी में मिल जाएंगे, और गणेश जी का एक दांत जिन्हें हम एकदंत भी कहते हैं यह हमें एकाग्रता और लक्ष्य पर ध्यान बनाए रखने की प्रेरणा देता है।
गणेश जी के हाथों में जो वस्तुएं होती हैं, उनका भी खास मतलब होता है। उनके एक हाथ में अंकुश होता है, जो हमें जागृत और सतर्क रहने की सीख देता है दूसरे हाथ में पास फंदा होता है, जिसका अर्थ है नियंत्रण। क्योंकि जब जागरूकता आती है, तो बहुत सी ऊर्जा भी पैदा होती है, और अगर उसे पर नियंत्रण न हो तो मन भटक सकता है।
अब सवाल आता है हाथी के सिर वाले भगवान चूहे पर क्यों सवार होते हैं? यह अजीब लगता है, लेकिन इसका गहरा मतलब है। चूहा उन रस्सियों को कुतर देता है जो हमें बांधती। या उसे मंत्र जैसा है जो हमारे अज्ञान को खत्म कर देता है जैसे चूहा छोटी-छोटी बाधाओं को पार कर लेता है, वैसे ही ज्ञान हमें अंधकार से बाहर की की और निकालता है।
गणेश चतुर्थी क्यों मनाया जाता हैं?
हमारे प्राचीन ऋषि बहुत ही गहरे ज्ञानी थे। उन्होंने ईश्वर को केवल शब्दों में नहीं बांधा, बल्कि प्रतीकों के रूप में समझाया। यही कारण है कि शब्द समय के साथ बदल जाते हैं, लेकिन प्रतीक कभी नहीं बदलते।
जब भी हम उस सर्वव्यापी परम शक्ति का ध्यान करें, तो हमें इन गहरे प्रतीकों को याद रखना चाहिए जैसे हाथी के सिर वाले भगवान गणेश। साथ ही यह भी याद समझना चाहिए कि गणेश जी कोई बाहर की शक्ति नहीं , बल्कि हमारे भीतर मौजूद बुद्धि और जागरूकता है। इसी समझ और ज्ञान के साथ जब हम गणेश चतुर्थी मनाते है, तब यह पर्व केवल पूजा नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और जागृति का त्यौहार बन जाता है।
भगवान गणेश जी के धड़ पर हाथी का सिर ही क्यों?
जब गणेश जी ने भगवान शिव का रास्ता रोका, तो इसका गहरा अर्थ यह है की अज्ञान (जो मन और मस्तिष्क से जुड़ा है) वह सच्चे ज्ञान को पहचान नहीं पाता। जब अज्ञान सामने आ जाता है, तो ज्ञान को उसे जीतना ही होता हैं। इसी भाव को समझने के लिए कथा में दिखाया गया है कि शिव जी ने गणेश जी का सिर काट दिया, यह कोई क्रोध या हिंसा नहीं बल्कि प्रतीक है अर्थात आज्ञा का नाश और ज्ञान का उत्पन्न।
बाद में विनायक जी को हाथी का सिर दिया गया, जो विशाल बुद्धि, विवेक और जग्गू रुकता का प्रतीक है। इसका संदेश यही है कि जब अज्ञान हटता है, तब सच्चा ज्ञान का जन्म होता है। हाथी ज्ञान शक्ति और कर्म शक्ति दोनों का प्रतीक माना जाता है। हाथी के दो मुख्य गुण होते हैं बुद्धि और सहजता उसका विशाल सिर गहरी सोच समझ और ज्ञान को दर्शाता है।
हाथी की एक खास बात यह है कि वह रुकता नहीं और न ही रास्ता बदलता है, जो भी बाधा सामने आती हैं, वह उसे अपने रास्ते से हटा देता है और आगे बढ़ जाता है। यही उसकी सहज और दृढ़ शक्ति का स्तंभ है। इसलिए भगवान गणेश का स्वरूप हाथी के समान है जब हम गणेश जी की पूजा करते हैं, तो हमारे भीतर भी बुद्धि, शक्ति, धैर्य और बाधाओं को पार करने की ऊर्जा जागृत होती है।
गणेश जी का प्रकट होने की घटना

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प्राचीन समय में सुमेरु पर्वत पर ऋषि सौभारि का बहुत सुंदर और शांत आश्रम था। उनकी पत्नी का नाम मनोमई था। वह बहुत ही सुंदर, संस्कारी और पवित्रवता नारी थीं। एक दिन सौभारि ऋषि लकड़ी लेने के लिए वन चले गए, आश्रम में मनोमई अपने घर के काम में लगी हुई थी। इस समय वहां कोंच नाम का एक दुष्ट गंधर्व आ पहुंचा। जब उसकी नजर अत्यंत सुंदर मनोमई पर पड़ी, तो वह उसे देखकर मोहित और व्याकुल हो गया।
कोंच गंधर्व ने ऋषि की पत्नी मानोमई का हाथ पकड़ लिया, मानोमई डर के मारे रोने लगी और कांपते हुए उससे दया की प्रार्थना करने लगी। उसी समय सौभारि ऋषि वहां पहुंच गए यह दृश्य देखकर वे बहुत क्रोधित हुवे, उन्होंने गंधर्व को तत्काल श्राप देते हुवे कहा “तूने चोर की तरह मेरी पत्नी का हाथ पकड़ा है, इसलिए तू मूषक (चूहा) बन जाएगा। अब तू धरती के नीचे रहेगा और चोरी करके ही अपना पेट भरेगा”।
ऋषि के श्राप से वही आगे चलकर वही गंधर्व चूहा बन गया। कोंच डर से कांपता हुआ ऋषि से क्षमा मांगने लगा, उसने कहा “हे दयालु ऋषि मैने अविवेक में आकर आपकी पत्नी का हाथ स्पर्श हुआ, कृपया मुझे क्षमा करे”। ऋषि ने उत्तर दिया “मेरा श्राप तो निष्फल नहीं होगा, लेकिन मैं तुम्हे एक वरदान देता हूं, द्वापर युग में , महर्षि पराशर के यहां गजमुख गणपति देव पुत्र रूप में प्रकट होंगे।
हर समय, हर युग में गणेश जी अवतार लेते रहते है, उस समय तुम उनके “डिंक नामक” वाहन बनोगे। हर देवता भी तुम्हारा सम्मान करेंगे और पूरा संसार तुम्हे “श्री डिंक जी” कहकर पुकारा और पूजा की जाएगा””। इस प्रकार , जो पहले अनियमित कर्म के कारण श्रापित हुआ, वहीं भगवान विनायक की सेवा से पूज्य बन गया, यह कथा हमें सिखाती है कि पश्चाताप और ईश्वर की कृपा से जीवन बदल सकता है।
जन्म का समय
विनायक जी का जन्म भाद्रपद महीने की शुक्ल चतुर्थी को मध्यान्ह समय माना जाता है। माथुर ब्राह्मणों के प्राचीन इतिहास के अनुसार, उनका जन्म लगभग 9938 विक्रम सांवत पूर्व भद्र पत्र शुक्ल चतुर्थी के दिन मध्यान्ह में हुआ था। वहीं पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, गजानन का जन्म सतयुग में हुआ था। इस कारण भद्रपद्र शुक्ल चतुर्थी को हम आज भी गणेश चतुर्थी थी के रूप में बड़े श्रद्धा और उल्लास से यह उत्सव मनाते हैं।
माता पार्वती ने विनायक जी को जन्म नहीं दिया, बल्कि अपने ही शरीर से उनकी रचना की। उसे समय गणेश जी का मुख सामान्य मनुष्य जैसा था, माता पार्वती ने नहाने के लिए जाते समय गणेश जी को घर की पहरेदारी करने का आदेश दिया और कहां की जब तक वह नहा कर वापस ना आ जाए, किसी को भी अंदर आने ना देना।
तभी द्वार पर भगवान शिव आए और बोले पुत्र, यह मेरा घर है मुझे भीतर जाने दो” लेकिन विनायक जी ने माता की आज्ञा का उल्लंघन ना करते हुए शिव जी को अंदर जाने से रोक दिया, इस घटना का गहरा अर्थ है की अज्ञान, ज्ञान को ना पहचानना, इसी भाव को दिखाने के लिए कथा में बताया गया है कि भगवान शिव ने गणेश जी का सिर काट दिया। यह कोई हिंसा नहीं, बल्कि अज्ञान के नाश का प्रतीक है। बाद में गणेश जी को हाथी का सिर मिला, जो उच्च बुद्धि, विवेक और ज्ञान का प्रतीक है।
प्रथम पूज्य का विवाह
शास्त्रों के अनुसार भगवान गणेश का विवाह भी हुआ था। उनकी दो पत्नियों मानी जाती है रिद्धि और सिद्धि इसे गणेश जी को दो पुत्र, जिनके नाम शुभ और लाभ बताए जाते हैं। इसी कारण गणेश जी की मूर्तियों के साथ अक्षर शुभ लाभ लिखा हुआ दिखाई पड़ता है।
सुबह लाभ में दोनों सांसारिक जीवन से जुड़े हैं, इसलिए इन्हें जन्म और मृत्यु के चक्र में आने वाला माना गया है। मान्यता है कि गजानन जी की पूजा से सिद्धियां और सांसारिक सफलता प्राप्त होती है। लेकिन पूर्ण मोक्ष केवल उनकी पूजा से नहीं, बल्कि आगे के आध्यात्मिक रास्ता से मिलताहै।
इन दो पुत्रों के अलावा गणेश जी की एक पुत्री भी मानी जाती है, जो “संतोषी माता” के नाम से मशहूर है। इस प्रकार विनायक जी का परिवार हमें सिखाता है कि जीवन में सिद्धि , समृद्धि, शुभता, लाभ और संतोष सभी का संतुलन आवश्यक है।
गणेश जी की प्रिय राशियां
भगवान विनायक को मेष, मिथुन कन्या, मकर, वृश्चिक और कुम्भ राशियां विशेष प्रिय मानी जाती है, जिन पर उनकी कृपा से सुख, समृद्धि, और बाधाओं से मुक्ति मिलती है। इनमें से मेष , मिथुन, और मकर राशि वालों पर विशेष आशीर्वाद रहता है, और कन्या राशि जातकों को आर्थिक लाभ और शिक्षा में सफलता मिलती है।
गणेश जी के प्रसिद्ध मंदिर कहां – कहां पर है?
भारत में विनायक जी के कई प्रसिद्ध मंदिर है, जिनमें मुंबई का सिद्धिविनायक मंदिर, पुणे का दगडूसेठ हलवाई गणपति, आंध्र प्रदेश का कनिपक्कम विनायक, राजस्थान का रणथंभौर (त्रिनेत्र गणेश) , और तमिलनाडु के उच्ची पिल्लयार मंदिर प्रमुख है, जो अपनी दिव्य प्रतिमाओं और पौराणिक महत्व के लिए जाने जाते है, खासकर सिद्धिविनायक मंदिर जो बॉलीवुड हस्तियों और भक्तों के लिए बहुत लोकप्रिय है और अष्टविनायक मंदिर समूह (महाराष्ट्र) भी बहुत प्रसिद्ध है।
डंगरूसेठ हलवाई गणपति मंदिर: अपनी विशालता और सामाजिक सेवा के लिए प्रसिद्ध, यह मंदिर लाखों श्रद्धालुओं को अपनी और आकर्षित करता है, डमरू सेठ हलवाई गणपति मंदिर पुणे महाराष्ट्र में पड़ता है।
गणेश चतुर्थी का त्यौहार
गणेश चतुर्थी मनाने के लिए मुंबई और पुणे सबसे प्रसिद्ध है, जहां बड़े– बड़े अभिनेता अपने घर पर विनायक जी की मूर्ति 3 दिन 5 दिन या 7 दिन के लिए रखते हैं और बड़े ही मन से तन से वह भक्ति से गणेश पूजन करते हैं। गणेश चतुर्थी का त्यौहार हिंदू के साथ-साथ मुस्लिम वर्ग के लोग भी मनाते है, शाहरुख खान, सलमान खान जैसे अभिनेता अपने घर में गणेश जी की मूर्ति रखते हैं और कार्यविधि संपन्न से पूजन करते हैं।
जहां बड़े पंडाल, भाग्य जुलूस और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं, इसके अलावा हैदराबाद गोवा और चेन्नई में भी यह त्यौहार बड़े उत्साह और विविधता के साथ मनाया जाता है। जिसमें हर जगह की स्थानीय परंपराएं और पंडाल होते हैं, जैसे कि हैदराबाद में कई हजार पंडाल और गोवा में पर्यावरण अनुकूल मूर्तियों का चलन है। यह त्यौहार वैश्विक त्यौहार की तरह मनाया जाने लगा जहां पर हिंदुओं का संगठन होता है वहां पर भक्ति मध्य वाले त्यौहार मनाएं जाते हैं।
निष्कर्ष
गणेश भगवान सिर्फ देवता नहीं , बल्कि बुद्धि, विवेक, ऊर्जा, शक्ति आदि श्रोतों के प्रतीक है। गणेश शब्द का अर्थ है, सभी कलेश को हटाना मतलब गणेश नाम में ही इतनी महिमा है कि सभी दोष, हानि आदि चीजों का निपटारा हो जाता है। गजानन सभी घरों में पूजे जाते है, और सभी कार्यों में प्रथम पूज्यनीय है अर्थात किसी भी कार्य की शुरूआत में “श्री गणेश” का होना तय है, जैसे विवाह, उदघाटन, नए समानों का लेना आदि।
सारांश
इस लेख में गणपति बप्पा का वर्णन सरल शब्दों में किया गया है, ताकि समझने आसानी हो, और गणेश शब्द के महत्व को सभी लोग समझे। अर्थात् गणेश भगवान हमारे जीवन से जुड़े हुए एक पहल है ताकि हमारा कार्य सफल और व्यवस्थित हो जाए। इसलिए हम प्रत्येक कार्यों में गणेश जी का पूजन और वंदन करते है।
















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