हनुमान:
हनुमान जी केवल एक देवता नहीं, बल्कि अटूट श्रद्धा, आनंद शक्ति और निस्वार्थ सेवा की सबसे बड़े प्रतीक है। इनके स्वभाव की विशालता को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है!
. महादेव के रुद्र अवतार: हनुमान जी को साक्षात भगवान शिव का 11 वां रुद्र अवतार माना जाता है। जब जब पृथ्वी पर धर्म की रक्षा के लिए विष्णु जी ने अवतार लिया, तब तक महादेव ने उनकी सहायता के लिए हनुमान रूप धारण किया।
. भक्ति की चरम सीमा: कहते हैं कि हनुमान जी के हृदय में साक्षात प्रभु श्री राम और माता सीता वास करते हैं। उनकी भक्ति ऐसी है कि वह स्वयं को राम जी का दास कहने में ही सबसे बड़ा गौरव अनुभव रखते हैं। उनके बिना रामायण और राम कथा अधूरी हैं।
. अजर अमर चिरंजीवी: महावीर जी उन सात महापुरुषों में से एक है जिन्हें “चिरंजीवी” होने का वरदान प्राप्त है। वे आज भी इस पृथ्वी पर सशरीर मौजूद है। जहां कभी भी सच्चे मन से राम नाम का संकीर्तन होता है, वहां हनुमान जी आदर्श रूप में उपस्थित रहते हैं जिन्हें कोई देख नहीं पाता।
. संकटमोचन और पालक: “संकट कटे मिटे सब पीरा, जो सुमिरे हनुमत बलबीरा।” वे अपने भक्तों के जीवन से हर बाधा, भय, और रोग को क्षण भर में हर लेते है। कलयुग में वे सबसे शक्तिशाली और ज्ञानी देवता माने जाते है, जो भक्त की एक पुकार पर दौड़े चले आते है।
क्यों खास है हनुमान जी की आराधना?
उनकी पूजा हमें सिखाती है कि अपार शक्ति होने के बावजूद विनम्र र कैसे रहा जाता है। वे बुद्धिमानों में प्रमुख हैं और बलवानो में सर्वश्रेष्ठ, फिर भी वे सदा प्रभु चरणों में समर्पित रहते है।
जन्म:

महावीर जी वानर राज केसरी और माता अंजना के पुत्र थे। वे अपने छह भाइयों में सबसे बड़े और अत्यंत बलशाली थे। रामायण के अनुसार हनुमान जी माता जानकी के विशेष प्रिय थे, इस धरती पर आठ चिरंजीवी माने जाते हैं जिनमें “मारुति नंदन” भी शामिल हैं।
हनुमान जी का अवतार त्रेता युग में राम जी की सहायता के लिए हुआ था। उनकी वीरता, और बुद्धि की अनगिनत कथाएं आज भी बड़े प्रेम से सुनाई जाती हैं। कभी समुद्र लांघना, कभी पर्वत उठाना तू कभी लक्ष्मण जी के लिए वैद्यराज सुसैन का घर उठाना सभी कार्य हनुमान जी के लिए संभव थे। बजरंगबली का पराक्रम की अनगिनत कथाएं जिनका कोई अंत नहीं है।
ज्योतिषियों की गणना के अनुसार महावीर जी का जन्म आज से लगभग 85 लाख वर्ष पहले, त्रेता युग के अंतिम चरण में हुआ था। उनका जन्म चैत्र पूर्णिमा, मंगलवार, चित्रा नक्षत्र और मेष मूहर्त में, प्रातः 6 बजकर 3 मिनट पर हुआ माना जाता है। यह पावन घटना भारत के महाराष्ट्र राज्य में नासिक जिले के अंजनेरी पर्वत पर घटी, जिसे प्राचीन काल में “ऋष्यमूक पर्वत” कहा जाता हैं।
हनुमान जी को बजरंगबली कहा जाता है, क्योंकि उनका शरीर वज्र यानी बिजली की तरह मजबूत और अटूट माना जाता है। वे पवन पुत्र के नाम से भी प्रसिद्ध है। मान्यता है कि वायु देवता ने बालक महावीर के पालन पोषण में विशेष भूमिका निभाई थी, इसलिए उनका संबंध हवा से जोड़ा जाता है।
संस्कृत में “मारुति” का अर्थ होता है हवा और “नंदन” का मतलब बेटा। इसी कारण हनुमान जी को मारुति या मारुति नंदन कहा जाता है अर्थात वायु देव के पुत्र।
वह हवा की तरह तेज, चंचल और शक्तिशाली हैं जहां इच्छा हुई, वहां पहुंच गए। उनकी गति, बाल और साहस को देखकर देवता भी अचंभित रह जाते थे। इसलिए हनुमान जी शक्ति, ऊर्जा, करुणा और अटूट भक्ति के प्रतीक माने जाते हैं।
सूर्य देव को निगलना

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हनुमान जी बचपन से ही अतुलनीय शक्ति के व्यापक थे, क्यों न होते क्योंकि उनके पिता केसरीराज और वायुदेव थे, और साथ ही भगवान शंकर के 11 वे रुद्र अवतार भी थे।
महावीर जी को उड़ना उनके पिता वायुदेव ने सिखाया था।
जब वे उड़ने लगे तो और ज्यादा शरारती और चंचल हो गए अपने उड़ान के कारण उन्होंने अपने दोस्तों और ऋषियों को सताने लगे एक बार उन्होंने तो हद पार कर दी भूख के कारण व्याकुल हनुमान जी उछलने मचलने लगे तभी उनको आसमान में उनको उगते हुवे सूर्यदेव दिखे उन्होंने सोचा ये तो बड़ा सा कोई लाल फल है, उसको खाने के लिए उन्होंने उड़ान भरी और सूर्य देव को खाने के लिए चल पड़े, जब तक सूर्य देव को निगल नहीं लिए तब तक उड़ते रहे |
लेकिन उन्होंने अंत में सूर्य देव को निगल ही लिया, जब उन्होंने सूर्य देव को निगला तो पूरे ब्रह्मांड में अंधेरा छा गया और मजबूरन इंद्रदेव को उन पर अपने वज्र का प्रहार करना पड़ा। इस प्रहार से हनुमान जी मूर्छित हो गए तभी वायुदेव पूरे ब्रम्हांड में वायु देना बंद कर दिया सभी लोगों में त्राहिमाम त्राहिमाम होने लगा। फिर ब्रह्मा जी आये और हनुमान जी को ठीक किया, और महावीर जी को उस समय अनेकों शक्तियां सभी देवताओं के माध्यम से मिली तभी से उनका नाम “हनुमान” पड़ गया।
उनके शरारत कम होने के नाम ही नहीं ले रहे थे, उन्होंने एक बार बालपन में साधु संतों का ध्यान भंग कर दिया जिससे साधुओं ने हनुमान जी को हल्का सा शाप दे दिया।
इस शाप के अनुसार महावीर जी अपनी अपार शक्तियों को भूल जाते थे और जब तक कोई उन्हें याद ना दिलाए, उन्हें अपनी शक्ति का भान नहीं होता था।
यही कारण था कि आगे चलकर जामवंत मंत्र जी ने उन्हें लंका जाने से पहले उनकी शक्ति का स्मरण कराया था। मान्यता है कि यदि हनुमान जी पर या शाप ना होता, तो राम रावण युद्ध का रूप ही कुछ और होता संभव है कि हनुमान जी अकेले ही रावण समेत पूरी लंका का अंत कर देते हैं।
हनुमान जी की प्रमुख घटनाएं:
महावीर जी का वर्णन रामायण के “सुंदरकांड” में भावपूर्ण और उनकी शक्तियों , तथा बुद्धि का वर्णन बड़े ही शानदार माध्यम किया गया है। हनुमान जी और श्री राम की प्रथम भेंट उसे समय हुई जब प्रभु राम अपनी वनवास काल में भ्राता लक्ष्मण के साथ माता सीता की खोज में भटक रहे थे। लंकापति रावण छलपूर्वक सीता माता का हरण कर चुका था खोज करते-करते दोनों भ्राता ऋषि मुख पर्वत के समीप पहुंचे जहां वनराज सुग्रीव अपने अनुयायियों सहित अपने बड़े भाई बाली के भाई से छिपकर रह रहे थे।
बाली ने एक भारी भ्रांति के कारण सुग्रीव को राज्य से निकाल दिया था और बिना उसकी बात सुनी ही उसे अपराधी मान लिया था इतना ही नहीं उसने सुग्रीव की पत्नी को भी बलपूर्वक अपने पास रख लिया था राम और लक्ष्मण को आते देख सुग्रीव घबरा गया और उनकी पहचान जानने के लिए अपने परम बुद्धिमान मंत्री हनुमान को भेजा।
हनुमान जी ने एक ब्राह्मण का वेश धारण किया और बड़ी ही मधुर, शुद्ध तथा प्रभावशाली वाणी में श्री राम से संवाद किया उनके मुख से निकल पहले ही शब्द सुनकर श्री राम ने लक्ष्मण से कहा— “जो वेद पुराण का गहन ज्ञान न रखता हो वह ऐसी भाषा बोल ही नहीं सकता।”
श्री राम को उसे ब्राह्मण के मुख, नेत्र, ललाट किसी भी अंग में भय और असत्य नहीं दिखा। उन्होंने यहां तक कहा कि इसकी वाणी सुनकर तो सत्र भी अस्त त्याग दे। फिर मुस्कुराते हुए बोले “जिस राजा के पास ऐसा गुप्तचर हो, उसकी विजय सुनिश्चित है” ।
श्री राम के मुख से यहां सुनते ही केसरीनंदन जी ने अपना वास्तविक रूप प्रकट किया प्रभु के चरणों में नतमस्तक हो गए श्री राम ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया। प्रशिक्षण भक्ति और भगवान का वह अमर मिलन हुआ, जो युगों युगों तक पूज्य बना रहा।
इसके बाद हनुमान जी ने श्री राम और सुग्रीव के मित्रता करवाई। आगे चलकर श्री राम ने बाली का वध कर सुग्रीव को उसका खोया हुआ सम्मान और राज वापस दिलाया। लंका युद्ध में सुग्रीव ने अपनी पूरी वानर सेवा के साथ श्री राम का साथ दिया।
सीता माता की खोज में बंदरों का एक दल दक्षिण समुद्र तट पर पहुंचा, परंतु अथाह सागर को लांघने का साहस किसी में नहीं था। स्वयं हनुमान जी भी गहन चिंता में डूब गए। तभी जामवंत जी सहित अन्य वानरों ने उन्हें उनकी भूली हुई अपार शक्तियों का याद कराया।
बस फिर क्या था शक्ति का स्मरण होते ही महावीर जी ने अपना विशाल रूप धारण किया और पवन के वेग से समुद्र को पार करने चल पड़े। मार्ग में उन्हें एक पर्वत ने रॉक और कहा कि उसे पवन देव का कर्ज है, इसलिए हनुमान थोड़ी देर विश्राम करें। परंतु समय की महत्व समझते हुए हनुमान जी विनर्मतापूर्वक धन्यवाद दिया और बिना रुके आगे बढ़ गए।
आगे एक राक्षसी ने उन्हें अपने मुख में प्रवेश करने की चुनौती दी। हनुमान जी ने चतुराई से उसका सम्मान किया पहले विशाल रूप धारण किया और फिर अत्यंत सच में होकर उसके मुख से प्रवेश कर तुरंत बाहर निकल आए। पराजित होकर उसे राक्षसी ने स्वीकार किया कि वह उनकी बुद्धि, विवेक , महानता और चतुराई की परीक्षा ले रही थी।
आखिरकार हनुमान जी सागर पार करके लंका पहुंचे और उन्होंने सर्वप्रथम लंका पति रावण के छोटे भाई विभीषण से भेंट कर माता सीता तक पहुंचे, अपने आराध्य की दी हुई अंगूठी माता सीता को दिया और पूरा रामायण का सार सुनाया तब जाकर माता सीता को हनुमान पर विश्वास हुआ।
हनुमान जी को लगी थी तेजी से भूख उन्होंने अपने भूख को कम करने के लिए रावण के बगीचे को अपना आहार बनाया, उन्होंने पूरे बगिया का तहस नहस कर दिया और साथ सभी पहरेदार और बगीचा अध्यक्ष जम्बूमाली को मृत्यु के घाट पहुंचाया। इस युद्ध शामिल हुवे रावण के छोटे बेटे “अक्षयकुमार” को भी हनुमान ने मृत्यु के घाट पहुंचा दिया|
उसके बाद मेघनाद ने आकर हनुमान से युद्ध किया, और हनुमान ने रावण की शक्ति को जानने के लिए स्वयं इंद्रजीत के बंधन में बंध गए और रावण के दरबार जाकर खूब उपद्रव किया, हनुमान को सजा के तौर पर पूछ में आग लगाई गई, उसी के आग से पूरा लंका का हनुमान दहन किया, उसके बाद आखिरी बार सीतामाता से भेंट कर श्री राम की और वापस लौट आए।
इसी तरह हनुमान जी श्री राम का पूरा सहयोग किया अंत में राम सहित उन्होंने रावण का अंत किया और भीभाषण को लंका का राजा बनाया उसके बाद माता सीता सहित और प्रभु राम के साथ अयोध्या को लौटे।
महाभारत में हनुमान का वर्णन
महाभारत एक और प्रमुख महाकाव्य है जिसमें हनुमान जी का संक्षिप्त वर्णन मिलता है। पाण्डवों के सभी पुत्रों का मारुति जी ने घमंड और अहंकार को चूर किया और साथ ही श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम जी का भी घमंड खत्म किया और महाभारत के युद्ध में धर्म की जीत दिलाई और अधर्म का नाश किया। इस युद्ध में हनुमान जी आरंभ से अंत तक रहते है, उर पाण्डवों का साथ देते है, अंत में कौरवों पर विजय हासिल कर ही लेते है, बाद में श्री कृष्ण हनुमान जी का पाण्डवों के सामने इस युद्ध में इनके महत्व का वर्णन करते है।
शनि देव के साथ युद्ध करना
एक बार हनुमान जी सूर्य देव के कहने पर शनिदेव को सबक सिखाते है, और उनका अभिमान और घमंड को खत्म करते है, अपने पूछ में लपेटकर उनको पूरे ब्रह्मांड का चक्कर लगाते है, इस कारण शनि देव को विभिन्न प्रकार के चोट लग जाते है, किन्तु हनुमान जी सरसों के तेल से शनि देव के सभी घाव भर देते है, अंत में शनि देव और रामदूत जी एक दूसरे के घनिष्ठ मित्र बन जाते है। महावीर जी की भक्ति करने से शनि दोष भी खत्म होता है, ऐसा शनि देव जी ने हनुमान जी से कहा था।
हनुमान जी के अनेक नाम
पवनपुत्र जी कई नाम है, जिनमें प्रमुख नाम है बजरंगबली, मारुति, पवनपुत्र, अंजनीपुत्र, संकटमोचन हनुमान, केसरीनंदन, महावीर, कपीश, और रामदूत, महावीर, लक्ष्मणप्राणदाता, महाबल, ब्रम्हचारी आदि अनेक नाम है।
हनुमान चालीसा
16 वी शताब्दी के भारतीय कवि तुलसीदास ने केसरीनंदन को समर्पित एक भक्ति गीत महावीर चालीसा लिखा था। उन्होंने हनुमान के साथ आमने सामने मुलाकात करने का दावा किया। इन बैठकों के आधार पर, उन्होंने रामचरितमानस, रामायण का संस्कृति भाषा से हिंदी के अवधि भाषा में अनुवाद किया। और रामदूत जी ने तुलसीदास जी को श्री राम से मिलाया था।
हनुमान जी की पूजा कैसी करनी चाहिए?
पवनपुत्र जी की पूजा के लिए मंगलवार या शनिवार का दिन विशेष होता है, स्नान के साफ वस्त्र (लाल शुभ) पहने, गणेश जी की पूजा से शुरुआत करें, फिर रामदूत जी की मूर्ति स्थापित कर उन्हें सिंदूर, चमेली का तेल, लाल फूल, जनेऊ, धूप दीप घी का चढ़ाएं, और हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का पाठ करे, अंत में बूंदी , गुड चना का भोग लगाकर आरती करे और प्रसाद बाटे, सबसे प्रमुख बात यह रखे कि मन को शुद्ध करे और ब्रम्हचर्य का पालन करे, यह पूजा और भक्ति के लिए अत्यंत जरूरी है।
हनुमान जी को पूजा में क्या पसंद नहीं है?
यह एक मान्यता है जो कुछ लोगों में प्रचलित है, और इसका कारण केसरीनंदन जी को ब्रह्मचारी मानना है, लेकिन हम किसी भी देवता को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा अराधना भक्ति करते है, और उनके पैर छूते है, लेकिन हनुमान जी स्त्रियों द्वारा जल चढ़ाने, वस्त्र अर्पित करने, चोला चढ़ाने और पैर छूने से क्रोधित व रूष्ट जाते है।
हनुमान जी प्रिय राशियां
मारुति नंदन को मुख्य रूप से मेष, सिंह , वृश्चिक और कुम्भ राशियां प्रिय है, क्योंकि इन राशियों के स्वामी ग्रह (मंगल, सूर्य और शनि) का सम्बन्ध केसरीनंदन जी से है और इन राशि के लोगों में निडरता, साहस, नेतृत्व, न्यायप्रियता, और भक्ति जैसे गुण होते है, जो केसरीनंदन जी को पसंद है।
हनुमान जन्मोत्सव कब मनाया जाता है?
हनुमान जन्मोत्सव या महावीर जयंती मुख्य रूप से चैत्र मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है, जो साल भर में ज्यादातर अप्रैल के महीने में होता है, और इसे उत्तर भारत में प्रमुख रूप से मनाया जाता है, यह त्यौहार हिंदुओं का विशेष त्योहारों में से एक है, इस त्यौहार को गर्मियों 5 मंगलवार के रूप में मनाई जाती है। इस त्यौहार में हर मंगलवार को भंडारा व रामदूत जी का सुंदरकांड, व रामायण का आयोजन होता है।
हनुमान जी की प्रसिद्ध मंदिर कहां पर है?
पवनपुत्र जी के कई प्रसिद्ध मंदिर है, जिनमें प्रयागराज का लेटे हनुमान मंदिर (गंगा जमुना केसंगम पर), अयोध्या का हनुमानगढ़ी, और सालासर राजस्थान का बालाजी मंदिर प्रमुख है, जहां भक्ति बड़ी आस्था से जाते हैं वहीं पर हनुमान जी का मंदिर बन जाता है। अन्य प्रसिद्ध मंदिरों में संकट मोचन, महावीर धारा और महावीर मंदिर पटना में शामिल है।
हनुमान जी का जैन धर्म में उल्लेख
जैन धर्म में पवनपुत्र जी को मोक्ष प्राप्त एक सिद्ध पुरुष माना जाता है, जो पद्म पुराण जैसे जैन ग्रन्थों में “कामदेव” और “विद्याधर” के रूप में वर्णित है, ना कि बंदर।
जान मान्यताओं के अनुसार, वे वानर वंश से थे जिसका अर्थ है मानव रूप या वानर चिन्ह वाले लेकिन शारीरिक रूप से सुंदर और मानवीय थे, उन्होंने राम के सहयोगी के रूप में कार्य किया और अंत में तंगी गिरी पर्वत पर मोच प्राप्त किया, जहां वे आज भी सिद्ध रूप में विराजमान, इसलिए जैन उन्हें एक वीर और धर्मात्मा व्यक्ति के रूप में पूछते हैं जो मोक्ष रास्ते पर ले चले।
हनुमान जी का बौद्ध धर्म में वर्णन
पवनपुत्र जी का वर्णन बौद्ध धर्म में सीधे तौर पर नहीं मिलता, लेकिन उनके जैसे शक्तिशाली, समर्पित वानर पात्र, जैसे चीन के महाकाव्य “जर्नी टू द वेस्ट” के “सन Wukong” पर उनका प्रभाव माना जाता है, जो महावीर जी के गुण जैसे शक्ति और समर्पण दर्शाते हैं, हालांकि बौद्ध धर्म में मुख्य रूप से बुद्ध और बोधिसत्वों जैसे वज्रपाणि पर जोर दिया गया है ना कि हिंदू देवताओं पर, लेकिन हिंदू देवी देवताओं को बौद्ध धर्म में नश्वर या बौद्ध सत्व के रूप में देखा जा सकता है।
निष्कर्ष
रामदूत केवल देवता नहीं बल्कि भक्ति, शक्ति, ज्ञान , ऊर्जा और बुद्धि का प्रतीक है। उन्होंने सच्चे मन से श्री राम की सेवा निस्वार्थ की। क्योंकि राम जी धर्म के प्रतीक थे, और वे एक मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम थे, इस कारण महावीर जी राम की सेवा और भक्ति सच्चे मन से की थी, और साथ मिलकर रावण का और उसकी सेना संहार किया था।
हनुमान जी आठ चिरंजीवी में से एक चिरंजीवी माने जाते है, हिंदू धर्म और ग्रंथों के हिसाब से केसरीनंदन जी हमारे बीच रहते है, और वे अभी भी जीवित है। हर साल सभी लोग मिलकर हनुमान की जयंती मनाते है, ताकि रामदूत जी हमेशा की तरह प्रसन्न रहे।
एक बार तो महावीर जी और उनके प्रभु के बीच युद्ध हुआ था, इस युद्ध का कारण था, वचन और माता का आज्ञा का पालन करना था, काशी नरेश की रक्षा के लिए हनुमान जी को श्री राम से लड़ना पड़ा था, इस युद्ध में महावीर जी ने न तो शस्त्र उठाया न ही अस्त्र उन्होंने सिर्फ राम नाम जपकर इस युद्ध को जीत लिया क्योंकि सभी लोग मिलकर हनुमान जी की भक्ति , बुद्धि और मन शक्ति की परीक्षा ले रहे थे।
सारांश
इस लेख में “पवन पुत्र हनुमान” के बारे में संपूर्ण सरल शब्दों में वर्णन है, जोकि हनुमान की भक्ति की ओर आपको ले जायेगा, और साथ ही आपको बुद्धि, शक्ति और ऊर्जा की प्राप्ति का रहस्य बताएगा।
















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