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शनि देव(Shani Dev) कौन है कर्माधिकारी , न्याय के देवता? जन्म, कथाएं, प्रिय वस्तुएं और प्रसन्न करने के उपाय

अगर आप भारतीय संस्कृति और धर्म में थोड़ी दिलचस्पी रखते है, तो आपने शनि देव का नाम जरूर सुना होगा। शनि देव को ज्यादातर लोग “सजा देने वाले देवता” समझते है, लेकिन असलियत इससे कहीं ज्यादा दिलचस्प है। वे हमारे कर्मों का हिसाब रखने वाले न्यायप्रिय देवता है, जो अच्छे काम का फल भी देते है, और गलत काम का परिणाम भी इसलिए शनिदेव को देवताओं में सबसे कठोर और न्यायप्रिय माना जाता है।

वे किसी का पक्ष नहीं लेते — न अच्छे का, न बुरे का— सिर्फ कर्मों के आधार पर सजा और न्याय देते है। जैसे — कोर्ट में ज़ज सबके पक्ष सुनकर सजा देते है, वैसे हमारे शनि देव,

तो सभी के न्यायाधीश होते है, चाहे वह मानव, हो या देवता। कहा जाता है कि जब शनि की दृष्टि पड़ जाती है, तो राजा भी रंक बन सकता है और जब प्रसन्न हो तो अच्छे कर्म हो तब साधारण व्यक्ति भी राजा बन सकता है। उनका स्वरूप गंभीर, शांत और रहस्यों से भरा हुआ है इसलिए लोग उनकी पूजा, आराधना भक्ति करते है, ताकि वे हमेशा प्रसन्न रहे है, और अपनी खराब, विनाश पूर्ण दृष्टि न डालें।

शनि देव का जन्म और इतिहास:

जन्म:

शनि देव देवी छाया और रोशनी के देवता सूर्य देव के पुत्र है। पौराणिक कथाओं के अनुसार , सूर्य देव की पहली पत्नी “संज्ञा” मानी जाती है, उनकी ही छाया को देवी छाया कहा गया, जिससे कर्माधिकारी की उत्पत्ति हुई। देवी संज्ञा की तीन संताने थी— वैवस्वत मनु, यमराज, और पुत्री यमुना इस अनुसार शनि देव के ये लोग भाई — बहन हुवे।

कर्माधिकारी की जन्म की कहानी—

शनि देव:

शनि देव:

एक बार देवी संज्ञा पति की ताप , और गर्मी सहने के लिए तपस्या करने चली गई उन्होंने अपनी छाया को उत्पन्न कर पति की सेवा में लगा दिया। परंतु इसका आभास सूर्य देव को नहीं हुआ जिससे सूर्य देव और देवी छाया के मिलन से शनि देव की उत्पत्ति हुई। शनि का जन्म लेने के बाद सूर्य देव तो जन्म से पहले प्रसन्न हुवे परंतु शनि देव जन्म से ही काले रंग के हुवे थे। उनके रंग के कारण सूर्य देव उनको कम पसंद करते थे।

देवी छाया के पुत्र होने के कारण कर्माधिकारी के पास जन्म से ही अद्भुत शक्तियां और सभी देवों, और भाइयों में ज्यादा शक्तिशाली थे। वे शुरुआत से ही शरारत करते थे, और अपने भाइयों और बहनों को परेशान करते थे। उनका बचपना दौर काफी लोकप्रिय और शरारती था।

इतिहास:

शनि देव का इतिहास पौराणिक कथाओं पर आधारित है, कहा जाता है की एक बार शनि देव की दृष्टि स्वयं के पिता सूर्य देव पर पड़ी जिससे सूर्य देव कुष्ठ रोग से गुजरे और उनके घोड़े काले रंग के हो गए इस कारण सूर्य देव और शनि देव की आपस में कम बनती थी।

परंतु शनि देव सूर्य देव पर क्रोधित होकर अपमानित होकर अपने पिता पर दृष्टि डाली थी इसके पीछे का कारण यह था कि सूर्य देव शनि देव का अनादर हमेशा किया करते थे और उन्हें अपने ही पुत्र पर संदेह था कि वह हमारे पुत्र नहीं है क्योंकि उनका रंग जन्म से ही काला था परंतु एक बार कर्माधिकारी के इष्ट देव स्वयं महादेव ने बताया की शनि देव आप ही का पुत्र है तब से सूर्य देव और कर्माधिकारी के बीच बनने लगी।

शनि देव को क्या पसंद है?

कर्माधिकारी सरसों का तेल, काला तिल, गुड, और लोहे की वस्तुएं पसंद है। उन्हें खुश करने के लिए शनिवार को इनका भोग लगाना और दान करना शुभ माना जाता है कर्माधिकारी को प्रसन्न करने के लिए कल और नीले रंग भी प्रिय हैं इस कारण शनिवार को कर्माधिकारी के पूजन बंधन के समय अगर कोई व्यक्ति या महिला काले रंग के कपड़े या नीले रंग के कपड़े पहनते हैं तो कर्माधिकारी अतिभोर प्रसन्न होते हैं। शनिवार को काला, नीला कपड़ा शुभ माना जाता है।

शनिदेव को इन सभी वस्तुएं से कैसे प्रसन्न करें —

तेल:

सरसों का तेल शनिदेव को बहुत प्रिय है शनिवार की शाम पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाना भी शुभ माना जाता है यह दिन शनि देव के लिए विशेष होता है इस तेल को चढ़ाने के बाद तेल को प्रसाद के रूप में ग्रहण कर कुष्ठ रोगियों को मन से लगाने पर उनका दर्द कम होता है और वह धीरे – धीरे ठीक हो जाते है।

भोजन और प्रसाद:

गुड, काले तिल के लड्डू या काले तिल से बनी हुई चीज और काली उड़द की दाल की खिचड़ी शनि जयंती पर गुड और काले तिल के लड्डू बनाकर चढ़ाना अच्छा होता है जिससे दिमाग में सकारात्मक विचार, मानसिक स्वास्थ्य , शारीरिक स्वस्थ इत्यादि प्रकार के गुण संपन्न होते हैं और शनिदेव भी प्रसन्न होते हैं।

वस्तुएं:

लोहे की वस्तुएं जैसे बर्तन अंगूठी जूते और चप्पल भी कर्माधिकारी को प्रिय हैं शनिवार के दिन लोहे के वास्तु में धारण करने पर शनि देव अति प्रसन्न होते हैं।

रंग:

कर्माधिकारी का पसंदीदा रंग कल और नीला माना जाता है क्योंकि शनि देव भी जन्म से ही काले थे और उनके प्रभु श्री कृष्ण भगवान नीले और काले थे इस कारण शनि देव को काला रंग भी बहुत पसंद है।

शनि देव को पसंद करने के उपाय:

कर्माधिकारी इत्यादि माध्यम से प्रसन्न होते हैं क्योंकि वह कर्म धर्म के अधिकारी हैं उनको सच्चे मन से दिल से याद करने पर जरूर हाजिर होते हैं शनिदेव को अनेक प्रकार के माध्यम से प्रसन्न किया जा सकता है।

. शनिवार को पीपल के पेड़ की पूजा करें और उसे पर सरसों का तेल चढ़ाएं और वह तेल गरीबों में बांटे जिससे जरूरतमंद को तेल की आवश्यकता पूर्ण हो जाए।
. शनिवार के शाम पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाकर सात चक्कर लगाए जिससे मन की भक्ति तन की शक्ति जागृत होती है।
. गरीबों और जरूरतमंदों को लोहे की वस्तुएं दान करें, शनिवार को स्वयं लोहे की वस्तुएं धारण करें।

. काले कुत्ते को भोजन खिलाना और बंदरों को गुड़, काले चने खिलाना भी लाभकारी माना जाता है और साथ ही कौवे को खाना खिलाना भी शुभ कार्य माना जाता है।
. मांस और मदिरा का सेवन त्यागे जिससे शनि देव प्रसन्न होते हैं।
. जुआ और ब्याज खोरी से बचें, क्योंकि शनि देव को यह गंदी आदतें पसंद नहीं है जिस घर में शनिदेव की भक्ति शक्ति और बढ़ती है और शनि देव की दृष्टि भी परिवार पर नहीं पड़ती है।

शनि देव किस पद पर विराजमान है?

कर्माधिकारी मुख्य रूप से कर्म फल दाता और न्याय के देवता है। जिन्हें भगवान शिव ने सभी जीवो को उनके कर्मों के अनुसार फल देने का अधिकारी बनाया है यानी अच्छे कर्मों का सुख और बुरे कर्मों का दंड जैसे साढ़ेसाती देने का अधिकार है वे अच्छे कर्म, धर्म , अनुशासन और निष्पक्षता के प्रतीक हैं , जो लोगों को विनम्रता और सत्य निष्ठा का ज्ञान देते हैं इसलिए उन्हें “कर्माधिकारी” भी कहा जाता है।

शनि देव के कार्य:

कर्मफल:
वे हर व्यक्ति के अच्छे बुरे कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं और उसी के अनुसार फल देते हैं जिससे सृष्टि का संचालन बना रहता है।

न्याय और दंड:
वे अत्याचार, अहंकार, छल कपट और धर्म करने वाले लोगों को दंडित करते हैं और उन्हें अपने जीवन काल में ही कष्ट भोगने पड़ते हैं इसी कारण उन पर शनि देव की साढ़ेसाती बनी रहती है।

अनुशासन:
शनि देव की दृष्टि से कोई नहीं बचता, क्योंकि उनको एक ऐसा वरदान है और एक ऐसा ही अभिश्राप है यह अभी श्राप उनकी पत्नी के द्वारा ही दिया गया था जिससे आगे चलकर यह दृष्टि उनके लिए शक्तिशाली शक्ति और कर्म फल के अधिकारी के पद पर बने रहने की नियुक्ति बनी रही। वे लोगों को सही रास्ते पर लाने के लिए कठिनाइयां देते हैं ताकि वे धर्म के मार्ग पर चले और अपने जीवन यापन में खुश रहें।

शनि देव के इष्टदेव कौन है?

कर्माधिकारी के इष्ट देव और प्रभु भगवान शिव है क्योंकि शनि देव ने एक बार शिव की कठोर तपस्या की थी जिससे महादेव के वरदान स्वरुप शनि देव को कर्म फल के दाता और न्याय के देवता के पद पर नियुक्ति मिली और उनको सभी ग्रहों के ऊपर माना जाता है।  कथाओं के अनुसार कर्माधिकारी के प्रभु भगवान कृष्ण को भी माना जाता है क्योंकि उनकी भक्ति में शनि देव हमेशा लीन रहते थे इस कारण शनि देव के प्रभु श्री कृष्ण को भी माना जाता है।

शनि देव की क्या सवारी है?

कर्माधिकारी की कई सवारियां , वाहन है। जिनमें कौआ, भैंसा, मोर, सियार, हाथी, घोड़ा, गधा, और हंस शामिल है लेकिन उनका सबसे प्रमुख और प्रिया वाहन कौवा है जो न्याय और सतर्कता का प्रतीक है। हर वहां अलग-अलग फल और प्रभाव दर्शाता है जैसे हंस शुभ और गधा अशुभ माना जाता है।

शनि देव के नौ वाहन और उनके सिद्धिफल:

कौवा (Crow):
शनि देव का मुख्य वाहन न्याय , और सतर्कता का प्रतीक माना जाता है।

हंस ( Swan):
सबसे शुभ वाहन, बुद्धि और भाग्य में वृद्धि करता है , आर्थिक लाभ देता है जिससे परिवार की मनोकामनाएं पूर्ण होती है।

मोर(Peacock):
सौभाग्य और कर्मों के सिद्धि का प्रतीक माना जाता है यह बहुत लाभकारी और शुभ कारी होता है।

शेर (Lion):
लायन चुनौतियों पर विजय और साहस का प्रतीक माना जाता है जिससे भक्ति करने वाले श्रद्धालुओं को शक्ति और साहस प्रदान होता है।

सियार (Jackal):
इस पर शनि का आना अशुभ माना जाता है।

हाथी (Elephant):
हाथी शनिदेव के वाहनों में शुभ माना जाता है और सुख समृद्धि का प्रतीक है।

घोड़ा (Horse):
मेहनत और फुर्ती का संतुलन बनाए रखना वाला प्रतीक है यह सफलता दिलाता है अधर्म पर धर्म की विजय लाता है।

गधा (Donkey):
गधा, आज शुभ माना जाता है यह कष्टकारी हो सकता है।

भैंसा (Buffalo):
भैंसा, न्याय और कर्म के हिसाब से फल देने वाला वाहन है।

कर्माधिकारी के अनेक नाम:

शनि देव को अनेकों नामों से जाना जाता है। जिनमें प्रमुख नाम है, सूर्यपुत्र, छाया पुत्र, मंद, कौनष्ठ, यम, सौरी, पिंगल, रौद्र, कक्कध्वज़, नीलवर्ण, सौम्य, ग्रहवाह, नीलचत्र, भक्तिवस्य , शरणं, सर्वाभीष्टप्रदायिन, कर्माधिकारी, और न्याय के देवता के नाम से जाने जाते है।

कर्माधिकारी को प्रसन्न करने वाले मंत्र:

कर्माधिकारी के कई मंत्र हैं जिनमें प्रमुख मंत्र “ओम शं शनैश्चराय नमः” , “ॐ प्रां प्रीम प्रौं सहा शनैश्चराय नमः” , “ॐ निलांजन समाभाषम रविपुत्रम यमाग्राज़म” प्रमुख है। जिनका जब शनिवार को शनि देव को प्रसन्न करने और कष्टों से मुक्ति पाने के लिए किया जाता है। यह मंत्र का जाप लगभग 108 बार करना चाहिए जिससे शनि देव जल्दी प्रसन्न होते हैं और सभी कष्ट हर लेते हैं परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।

शनि देव का विवाह किससे हुआ था?

शनि देव का विवाह गंधर्वराज चित्र रथ या चित्रसेन की पुत्री ध्वजनी या दामिनी नाम की कन्या से हुआ था। लेकिन भगवान कृष्ण की भक्ति में लीन रहने के कारण वह अपनी पत्नी को समय नहीं दे पाए , जिस कारण पत्नी ने क्रोध में आकर उन्हें श्राप दिया कि उनकी दृष्टि जिस पर पड़ेगी वह नष्ट हो जाएगा इसके बाद शनि देव अपना सर झुका कर चलने लगे।

ज्योतिष के अनुसार शनि देव की अन्य आठ पत्नियां और थी। जिसमें दामिनी, कंकाली, कल हां प्रिया, कंटकी, तुरंगी, महर्षि और आज नाम की थी। शनि देव की पत्नियों के नाम जपने से शनि देव प्रसन्न होते है। कुछ कथाओं में नीलिमा नाम की कन्या से शनि देव का पहला विवाह हुआ था, उन्हीं के सहयोग से शनि देव के पास अनेक शक्तियां थी।

शनि देव और हनुमान की कहानी क्या है?

कर्माधिकारी और हनुमान की कई कहानियां प्रचलित है जिनमें मुख्य रूप से दो कहानी प्रमुख हैं। एक बार हनुमान जी ने शनिदेव के अहंकार वश बाधा डालने पर अपनी पूछ में लपेटकर दंड दिया। जिससे शनि देव का घमंड चूर हुआ शनि देव के माफी मांगने पर जो कोई तुम पर सरसों या तिल का तेल चढ़ाएगा उसकी सारी मनोकामना पूर्ण होगी।

दूसरी कथा में हनुमान जी ने रावण के कैद से शनि देव को मुक्त कराया जिससे दोनों में गहरी मित्रता हुई और इसलिए हनुमान पूजा से शनि दोष शांत होता है।
शनि देव की सबसे प्रिय राशि कौन सी मानी जाती है?

कर्माधिकारी की सबसे प्रिय राशियों में तुला, मकर और कुंभ राशि सम्मिलित है दिन में तुला राशि को विशेष स्थान प्राप्त है क्योंकि शनि इसमें उच्च के होते हैं, जिससे इन राशियों पर शनि देव की विशेष कृपा रहती है और इन्हें सुख , समृद्धि और सफलता मिलती है। खासकर तुला, मकर और कुंभ पर शनि देव की मेहरबानी बनी रहती है

राशियों का प्रभाव :

. तुला राशि (Libra):
शनि देव की यह उच्च राशि है, जिससे तुला राशि वालों पर शनि की विशेष कृपा होती है और उन्हें धन, वैभव, और भौतिक सुख मिलता है।

. मकर राशि (Capricorn):
यह शनि की अपनी राशि है जिसे स्वराशि कहते है। जिस पर शनि देव का आधिपत्य होता है, मकर राशि वाले मेहनती और अनुशासित होते है, और शानदेव उन्हें सफलता दिलाते है।

. कुंभ राशि ( Aquarius):
यह भी शनि की स्वराशि है और मूल त्रिकोण राशि है। कुंभ राशि के जातक परोपकारी और सामाजिक होते है, और शनि उन्हें धनवान बनाते है। जिससे घरपर सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।

. वृषभ राशि (Taurus):
शनि देव और वृषभ राशि के स्वामी शुक्र की मित्रता के कारण, वृषभ राशि वालों को करियर, और व्यापार में शुभ फल मिलते है।

आईए हम आपको शनि देव के प्रमुख मंदिरों की संख्या बताते है, और कहां है?

शनि देव का सबसे प्रमुख मंदिर महाराष्ट्र का शनि शिंगणापुर माना जाता है, दिल्ली का शनि धाम, उत्तरप्रदेश में प्रतापगढ़ के जंगल स्थित शनि देव का चमत्कारी मंदिर स्थित है।

 

निष्कर्ष (Conclusion):

इस आर्टिकल में यह निष्कर्ष निकलता है की शनिदेव केवल “सजा देने वाले देवता” नहीं है बल्कि वह सृष्टि में धर्म अनुशासन और सत्य निष्ठा को बनाए रखने वाले एक शक्तिशाली और न्याय प्रिय “कर्माधिकारी” है। उनका उद्देश्य लोगों को भयभीत करना नहीं बल्कि उन्हें उनके कर्मों के प्रति जवाब देह बनाना और सही मार्ग पर लाना है।

उनकी पूजा और आराधना से सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त होती है विशेष कर तब जब व्यक्ति सच्चे मन से अच्छे कर्म और धर्म का पालन करता है उन्हें सरसों का तेल अर्पित करना और गरीबों की मदद करना उनके क्रोध को शांत करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का मुख्य उपाय है। अगर हम आपको संक्षेप में बताएं की शनि देव किस प्रकार के देवता है तो शनिदेव कर्म आधारित न्याय के प्रतीक दर्शाने वाले निष्पक्षता , अनुशासन , धर्म के सौंदर्य पूर्ण देवता है।

सारांश (Summary):

शनि देव को कर्म फल दाता और न्याय के देवता के रूप में जाना जाता है, जो कठोर और निष्पक्ष न्याय करते हैं। वे अच्छे कर्मों का फल और बुरे कर्मों का दंड देते हैं जिससे राजा भी रंक बन सकता है। उनका जन्म देवी छाया और सूर्य देव से हुआ था, और वे महादेव के वरदान से यह पद प्राप्त कर सभी ग्रहों में पूजने हुए।

उन्हें प्रसन्न करने के लिए सरसों का तेल, काला तिल, गुड, और लोहे की वस्तुएं प्रिय हैं, जिन्हें शनिवार को दान करना या अर्पित करना शुभ माना जाता है। काला और नीला रंग भी उन्हें अति प्रिय है उनकी सवारी में कौवा सबसे प्रमुख है जो न्याय का प्रतीक है। हनुमान जी की पूजा से भी शनि दोष शांत होता है क्योंकि हनुमान जी उन्हें रावण के कैद से मुक्त कराया था और उनके परम मित्र में हुवे। शनि देव को तुला, मकर, कुंभ और वृषभ राशि सबसे प्रिय मानी जाती है, जिन पर वे अपनी कृपा बनाएं रखते है।

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