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भगवान विष्णु कौन हैं?: सृष्टि के पालनहार, उनके स्वरूप और “10 वा अवतार” का संपूर्ण वर्णन

हिंदू धर्म की विशाल और रोमांचक कहानियां में भगवान विष्णु का किरदार किसी “प्रकृति रक्षक” जैसा है, जिन्हें हम प्यार से नारायण या हरि भी कहते हैं।  अगर यह पूरी दुनिया एक फिल्म है, तो विष्णु जी इसके वह डायरेक्टर और प्रोड्यूसर है जो पहन के पीछे रहकर पूरी सृष्टि का ख्याल और देखभाल करते हैं और संतुलन बनाए रखते हैं।

उनकी सबसे दिलचस्प बात यह है कि जब भी दुनिया में बुराई का पलड़ा भारी होता है और अधर्म का जोर बढ़ता है, वे चुपचाप बैठकर तमाशा नहीं देखते, बल्कि “जनरक्षक” की तरह नए-नए अवतार लेकर धरती पर एंट्री मारते हैं। वैष्णव परंपरा में तो उन्हें ही सबसे बड़ा “सर्वोपरि प्रधान” माना गया है, जो शांत रहकर भी ब्रह्मांड की हर छोटी बड़ी हल-चल को नियंत्रण में रखते हैं।

भगवान विष्णु

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हिंदू धर्म के महान पुराने के अनुसार, भगवान विष्णु उस त्रिमूर्ति के मुख्य सदस्य हैं जो पूरी दुनिया का देखभाल करते हैं, जहां ब्रह्मा जी इस संसार को बनाने वाले हैं और शिव जी संहारक और पुनः निर्माण करने वाले है, वही विष्णु जी इस पूरी सृष्टि के पालनहार हैं।

हालांकि यह तीनों एक ही शक्ति के अलग-अलग रूप है, लेकिन विष्णु जी का रोल सबसे ज्यादा रोमांचक है क्योंकि वह समय आने पर पृथ्वी पर निम्नलिखित प्रकार के अवतार लेते हैं ताकि हम इंसानों को सही और गलत का फर्क समझा सके।

उनके अब तक के अवतारों की संख्या, में 9 अवतार आ चुके हैं अब वह अपने दस वे अवतार की और बढ़ने वाले हैं वह अवतार “कल्कि” का होगा और कलयुग में लेंगे और अपने भक्तों का उद्धार करेंगे।

वैष्णव धर्म के अनुसार, भगवान विष्णु इस ब्रह्मांड की वह शक्तिशाली ऊर्जा है जिनकी कोई सीमा नहीं है, वह एक ऐसी अनंत ऊर्जा (परम ब्रह्म) है जिनका अपना कोई एक निश्चित आकार तो नहीं है, लेकिन वह हर गुण से संपन्न है। उनका अंदाज बड़ा निराला है वह जितने दयालु और शांत दिखते हैं, समय आने पर उतने ही प्रभावशाली भी हो जाते हैं।

उनकी सबसे मशहूर और आराम करने वाली वह चित्र है जिसमें वह अपनी पत्नी लक्ष्मी जी के साथ “क्षीर सागर” की दूधिया समुद्र में “शेषनाग” के ऊपर आराम फरमा रहे होते हैं। यहां शेषनाग कोई साधारण सांप नहीं बल्कि “प्राचीन अतीत” का प्रतीक है, जिस पर लाकर विष्णु जी बड़े आराम से पूरी दुनिया की हर हल-चल पर नजर रखते हैं और यह एहसास करते हैं कि समय चाहे कैसा भी हो, वे पूरी दुनिया को बड़े प्यार से संभाल रहे हैं।

जब भी इस दुनिया में बुराई का शोर मस्त है और राक्षस हावी होने लगते हैं, भगवान विष्णु एक सुपर हीरो की तरह एंट्री लेते हैं ताकि राक्षसों का विनाश कर फिर से ब्रह्मांड में शांति को स्थापित कर दिया जाए। उनकी यह अवतार लेने की कल ही उन्हें सबसे खास बनाती हैं, जिसमें “दशावतार” यानी उनके 10 प्रमुख अवतारों की कहानी सबसे विख्यात है। इन 10 अवतारों में से “श्री राम” और “श्री कृष्णा” की भूमिका सबसे ज्यादा दमदार और महत्वपूर्ण रही है।

श्री राम का अवतार त्रेता युग में लिया था और श्री कृष्ण का अवतार द्वापर युग में लिया था। जिन्होंने न सिर्फ धर्म का विनाश किया बल्कि हमें जीवन जीने का सही तरीका भी सिखाया। एक तरह से समझिए कि विष्णु जी वह मददगार, दमदार और मुसीबत आने पर धरती पर अवतार ले लेते हैं और अपने भक्तों की रक्षा करते हैं।

पुराणों की कहानियों के अनुसार, भगवान विष्णु का जीवनकाल किसी सम्राट से भी ज्यादा भव्य और दिलचस्प है, जहां धन और सौभाग्य की देवी लक्ष्मी जी उनकी पत्नी है, वही तुलसी को भी उनके दिल में वही खास जगह मिली है, इसलिए उन्हें “विष्णुप्रिय” के नाम से जाना जाता है। नारायण का ठिकाना कोई साधारण महल नहीं, बल्कि दूध का विशाल “क्षीर सागर” है।

जहां वे समय के प्रतीक शेषनाग की शैय्या पर विराजमान है, सबसे जादुई बात तो यह है कि उनकी नाभि से एक दिव्य कमल निकलता है, जिसके ऊपर सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी विराजमान है, यानी कहा जा सकता है, कि पूरे ब्रम्हांड का निर्माणकर्ता “श्री हरि” जी है।

भगवान विष्णु के चार हाथ है, उन्हीं हाथों से सृष्टि को चलाते है और राक्षसों का विनाश करते है, वे अपने नीचे वाले बाएं हाथ में कमल पद्म ( थामते है जो शांति और सुंदरता का प्रतीक है, तो नीचे वाले दाहिने हाथ में उनकी कौमुदकी गदा है जो अनुशासन की महत्त्व को दर्शाता है।

वही ऊपर वाले बाएं हाथ में उनका पाञ्वजन्य शंख है जिसकी गूंज से बुराई की रूह तक कंपन करने लगती है, और ऊपर वाले दाहिने हाथ ने हमेशा तैयार रहने उनका घातक सुदर्शन चक्र है, जो पलक झपकते ही अधर्म का सफाया कर देता है।
भगवान विष्णु असल में हमारे जीवन के ऊर्जा के संसाधन और संकट के समय देवताओं के सबसे बड़े अस्त्र और शास्त्र हैं। जब भी स्वर्ग पर कोई मुसीबत आती है, तो सभी देवता मदद के लिए उन्हीं के पास दौड़ते हैं। उनकी जीवनशैली को दर्शाने वाले चंबा पहाड़ी शैली के खूबसूरत चित्रों में उन्हें अक्सर अपनी दोनों पत्नियों (लक्ष्मी, और भूदेवी) के साथ अपने तेज दौड़ने वाली सवारी गरुड़ पर सवार दिखाया जाता है।

भगवान विष्णु नाम का अर्थ:

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“विष्णु” शब्द संस्कृत की “विष” धातु से बना है, जिसका सीधा और सरल मतलब है “व्यक्ति” या हर जगह फैला होना। प्राचीन विद्वानों के अनुसार, उन्हें विष्णु इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे इस ब्रम्हांड की हर चीज के अंदर “प्रवेश” किए हुवे है और कण कण में मौजूद है। आसान शब्दों में कहें तो , विष्णु वह शक्ति है जो पूरी सृष्टि के आर पार बसी हुई है और दुनिया का ऐसा की कोना नहीं जहां हरि की मौजूदगी न हुई हो।

महान विद्वान आदि शंकराचार्य के अनुसार, “विष्णु” विष्णु का अर्थ है वह जो पूरी तरह मौजूद है। उन्होंने विष्णु पुराण का हवाला देते हुए समझाया है कि विष्णु एक विष धातु से बना है जिसका मतलब है प्रवेश करना, मतलब पूरी दुनिया में हर जगह विराजमान होना, कण कण में बसना विष्णु जी है।

ऋग्वेद के महान जानकारों और विद्वानों ने भी एक सुर में माना है कि “विष्णु” का असली मतलब है “विश्वव्यापी”। आचार्य सायन से लेकर श्रीपाद दामोदर सातवलेकर तक, सभी कहते है कि वे ऐसे देव है जो पूरी सृष्टि में व्याप्त है। यहां तक की महर्षि दयानंद सरस्वती ने उन्हें “सर्वव्यापी परमात्मा” तो कहा ही साथ उन्हें परम विद्वान का आसान भी दिया है।

विष्णु जी का जन्म:

भगवान के जन्म का कोई निश्चित स्थान और तिथि नहीं है, हालांकि उनके अवतारों का वर्णन रामायण, महाभारत आदि हिंदू ग्रंथों में मिलता है। विष्णु जी अजन्मा है, जिनका जन्म नहीं हुआ, वे सृष्टि से पहले भी थे और सृष्टि के अंत तक भी रहेंगे। आदि ग्रंथों , और मान्यताओं के अनुसार नारायण की माता “देवी दुर्गा” और पिता “परम ब्रह्म” है, जिनसे त्रिदेवों का जन्म हुआ है, (अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, महेश)।

विष्णु जी का विवाह

श्री हरि का विवाह माता लक्ष्मी से हुआ था, “समुद्र मंथन” के दौरान 14 रत्न निकले थे, उन रत्नों में माता लक्ष्मी भी एक रत्न थीं देवी लक्ष्मी के सौंदर्य और सुंदरता से सभी देव, और असुर माता लक्ष्मी को पाना चाहते थे, परंतु माता लक्ष्मी ने अपना पति नारायण को चुना, स्वयंबर के दौरान माता लक्ष्मी में विष्णु जी के गले में वरमाला डाला।

भगवान विष्णु का विवाह माता लक्ष्मी के अलावा और भी अन्य देवियों के साथ हुआ था। नारायण का विवाह (तुलसी) वृंदा जिनसे शालिग्राम रूप में हुआ था, और पद्मावती (भूमिदेवी) जिनका विवाह वेंकटेश्वर स्वरूप में माना जाता है।

. तुलसी (वृंदा):

एक बहुत ही प्रतापी और शक्तिशाली राक्षस “जालंधर” की पत्नी वृंदा (तुलसी) के श्राप के कारण , श्री हरि ने शालिग्राम रूप में तुलसी से विवाह किया यह विवाह हर वर्ष “तुलसी विवाह” के रूप में मनाया जाता है, जो प्रबोधिनी एकादशी को होता है।

. पदमावती (भूमिदेवी):

श्री नारायण का विवाह पृथ्वी से हुआ था, जब उन्होंने वराह के अवतार में हिरण्याक्ष राक्षस से बचाया था, उसके तत्पश्चात उन्होंने पद्मावती से विवाह किया था।

नारायण को प्रसन्न करने वाले व्रत।

नारायण को प्रसन्न करने वाले प्रमुख व्रत मुख्यत दो है, एकादशी व्रत और बृहस्पतिवार का व्रत।

बृहस्पतिवार व्रत का वर्णन:

बृहस्पतिवार का व्रत विष्णु भगवान और देवों के गुरु “बृहस्पति” का होता है। बृहस्पति व्रत का गहरा संबंध भगवान नारायण से माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार बृहस्पति देव स्वयं भगवान नारायण के परम भक्त और देवताओं के गुरु हैं जिस प्रकार नारायण धर्म, मर्यादा और सृष्टि के संरक्षण के देवता वैसे ही बृहस्पति देव संसार में धर्म, ज्ञान और सदाचार का प्रतीक है।

कहां जाता है कि गुरुवार भगवान विष्णु का प्रिय दिन है, इसलिए इस दिन बृहस्पति व्रत रखने से नारायण की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इसी कारण पूजा में पीले रंग का प्रयोग होता है, क्योंकि पीला रंग विष्णु और बृहस्पति दोनों को प्रिय हैं।

बृहस्पति व्रत की कथा में यह संदेश मिलता है कि जो व्यक्ति नारायण का स्मरण करते हुए बृहस्पति व्रत करता है, उसके जीवन में दरिद्रता दूर होते हैं और सौभाग्य का उदय होता है। यह व्रत वास्तव में नारायण भक्ति के माध्यम से गुरु तत्व को प्रसन्न करने का संसाधन है।

एकादशी का व्रत:

एकादशी का व्रत हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को समर्पित एक अत्यंत पवित्र व्रत है। यह व्रत हर महीने शुक्ल और कृष्ण पक्ष के 11वीं तिथि एकादशी को रखा जाता है। मान्यता है की एकादशी के दिन नारायण की विशेष कृपा प्राप्त होती है और मन, वचन व कर्म की शुद्धि होती है।

इस दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्रधारण किए जाते हैं और भगवान नारायण की पूजा की जाती है। व्रत रखने वाले लोग अनाज का त्याग करते हैं और फल, दूध या जल पर रहते हैं। कुछ लोग निर्जल व्रत भी करते हैं। दिनभर “विष्णु सहस्त्रनाम,” “ओम नमो भगवते नारायण नमः”, मंत्र का जाप और एकादशी कथा का श्रवण किया जाता है।

धार्मिक मान्यता है की एकादशी व्रत से पापों का नाश, मां की शांति, पारिवारिक सुख और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह उपवास आत्म संयम, भक्ति और वैराग्य का प्रतीक माना जाता है। एकादशी व्रत से हमें यह शिक्षा मिलती है कि श्री हरि की भक्ति और संयमित जीवन से ही सच्चा कल्याण संभव है।

विष्णु भगवान की प्रिय राशियां

भगवान नारायण की प्रिय राशि के रूप में शास्त्रों और ज्योतिष में मुख्यता “मीन राशि” को माना जाता है। मीन राशि के स्वामी स्वयं देव गुरु बृहस्पति है, जो भगवान नारायण के परम भक्त माने जाते हैं। इस रस में भक्ति, करुणा, त्याग और आध्यात्मिकता के गुण प्रबल होते हैं, जो श्री हरि तत्व से सीधे जुड़ जाते हैं।
इसके अलावा धनु राशि भी भगवान विष्णु को प्रिय राशि मानी जाती है, क्योंकि इसका स्वामी भी बृहस्पति हैं और यह धर्म, ज्ञान और सत्य का प्रतीक है।

भगवान विष्णु के प्रसिद्ध मंदिर

भगवान विष्णु के अनेक प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर भारत में स्थित है जैसे— तिरुपति बालाजी मंदिर (आंध्र प्रदेश) यह नारायण के वेंकटेश्वर रूप का विश्व प्रसिद्ध मंदिर है। श्रीरंगम रंगनाथ स्वामी मंदिर (तमिलनाडु) यह मंदिर भगवान विष्णु के शेषनाग पर चयन करते स्वरूप का सबसे बड़ा प्रसिद्ध मंदिर है। बद्रीनाथ धाम (उत्तराखंड) यह मंदिर चारों धामों में एक, यहां श्री नारायण बद्री विशाल के रूप में पूजे जाते हैं।

पदमा नाभ स्वामी मंदिर (केरल) यहां मंदिर अपार संपत्ति और अनंत सयन मुद्रा की लिए प्रसिद्ध है। जगन्नाथ पुरी (ओड़िशा) यह मंदिर श्री नारायण के जगन्नाथ रूप का मंदिर, रथ यात्रा के लिए प्रसिद्ध माना जाता है। द्वारकाधीश मंदिर (गुजरात) यह मंदिर भगवान कृष्ण नारायण के अवतार की नगरी द्वारका में स्थित है। वैकुंता चालीपति मंदिर जिसे तिरुमला मंदिर भी कहते हैं यह मंदिर आंध्र प्रदेश में स्थित है, इस कलयुग का बैकुंठ धाम कहा जाता है।

भगवान विष्णु के अनेक नाम

श्री हरिनारायण के अनेक नाम की श्रृंखला है सभी नाम गिनना तो असंभव है किन्तु कुछ नाम प्रसिद्ध है जैसे— नारायण, विष्णु, हरि, माधव, गोविंद, केशव, दामोदर, वासुदेव, जगन्नाथ, लोकनाथ, विश्वंभर, पालनहार, दीनदयाल,त्रिविक्रम, वामन, पद्मनाभ, पुरुषोत्तम, अनंत, अच्युत, श्रीहरि, श्रीमन नारायण, लक्ष्मीपति, श्रीधर, आदि।

अवतरण लेने वाले नाम

राम, कृष्ण, नृसिंह, वराह, वेंकटेश्वर, जगन्नाथ, वामन, कल्कि आदि। भगवान विष्णु ने “सतयुग” में मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह और “त्रेतायुग” में वामन, परशुराम, श्री राम और “द्वापरयुग” में श्री कृष्ण और “कलयुग” में कल्कि का अवतार लेंगे। इस तरह भगवान विष्णु दस 9 अवतार के चुके है, अब 10 वी अवतार की ओर बढ़ रहे है।

निष्कर्ष:

भगवान विष्णु सिर्फ देवता नहीं, बल्कि सृष्टि संचालन व पालनहार है। जब जब अधर्म बढ़ता है, तब तब नारायण धरती पर अवतार लेते है, इसलिए उन्हें सुपर मैन कहा जाता है। नारायण का अवतार जी अलौकिक होता है, और पूरे ब्रह्मांड में प्रकाशित हो जाते है|

सबसे खास बात तो यह है कि जब वे मानव के रूप में अवतार लेते है, तो पूर्णतया मानव वाला ही जीवन व्यतीत करते है। भगवान विष्णु के साथ अनेक देवता भी धरती पर अवतरण में रहते है। वे एक दूसरे का हाथ पकड़कर या साथ देकर राक्षसों का विनाश करते है।

सारांश

इस लेख में भगवान विष्णु का वर्णन एकदम सरल शब्दों में किया गया है, जी कि आपको पढ़ने वा समझने में आसानी होगा। भगवान विष्णु से जुड़ी हुई प्राथमिक बातों को इस लेख में बताया गया है।

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