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“नवरात्रि में नौ दुर्गा की पूजा विधि और दशहरा का महत्व”

 

“नवरात्रि में नौ दुर्गा की पूजा विधि और दशहरा का महत्व”

 

नव रात्रि आने वाली है जो की माँ के पावन दिन होते है | नवरात्रि का अर्थ है कि ”नौ रातें” जो की नवरात्रि में मनाया जाता है | यह धर्म हिन्दुओं के लिए विशेष माना जाता है | क्योंकि ये दिन माँ जगदम्बा को समर्पित होते है | क्योंकि कहा जाता है कोई भी काम नारी शक्ति के बिना अधूरा होता है |

 

जैसे कि राम का नाम अधूरा है राम के आगे जब तक सीता नहीं लगेगा तब तक अधूरा होता है जैसे की सीताराम कहा न जाये | इसी लिए नवरात्र नारियों के लिए विशेष होती है | नवरात्रि में माँ दुर्गा के नवो रूपों को पूजा जाता है | क्योकि माँ दुर्गा के नवो रूप आदि माँ शक्ति के ही रूप है | माँ दुर्गा के नवो रूपों का अलग -अलग महत्व है | माँ दुर्गा के नवो रूपों का नाम भी अलग -अलग है जैसे कि-

1. शैलपुत्री
2. ब्रह्मचारी
3. चंद्र घंटा
4. कूष्मांडा
5. स्कंदमाता
6. कात्यायनी
7. कालिरात्रि
8. महागौरी
9. सिधिदात्री

नवरात्रि हर वर्ष आती है | नवरात्रि साल में दो बार आती है चैत्र नवरात्रि और शरदीय नवरात्रि , शरदीय नवरात्रि को अश्वनी नवरात्रि भी कहा जाता है | नवरात्रि में हिन्दू धर्म में ज्यादातर लोग उपवास रखते है | ये उपवास लगभग नौ से दस दिन तक सभी लोग रखते है | माता के उपवासों में सभी लोगो को फराहरी खाना, खाना होता है | ज्यादातर लोग इन दिनों फल खाकर ही अपना उपवास पूरा करते है इन उपवासों में माँ खुश होती है |

लोगो की इक्षा भी पूरी है जिन्हें मनोकामना कहते है | सब लोगो की मनोकामना अलग -अलग होती है | यह त्यौहार भारत के अलग- अलग छेत्रो में अलग – अलग तरीके से मनाया जाता है | जैसे पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के रुप्प में मनाया जाता है | दुर्गा पूजा भारत के विभिन्न छेत्रो में मनाया जाता है | परन्तु गुजरात में गरबा और डंडिया खेल कर नवरात्रि मनाया जाता है यह खेल पूरी रात्रि चलता है |

नवरात्रि के बाद दशमी आता है | जिसे लोग विजयादशमी और दशहरा के नाम से जानते है और दिन बुराई के ऊपर अच्छाई के जीत के रूप में मनाया जाता है | दशहरा में रावण का पुतला मर्यादा पुर्शोत्तम श्रीराम के हाथों जलाया जाता है |

नवरात्रि में दुर्गा पूजा और दुर्गा अष्टमी विशेष होता है | नवरात्रि में नव दुर्गा के रूपों का भी उल्लेख मिलता है |

आप सबको विस्तार से समझने के लिए इन लिंकों को टच करे |
1. दुर्गापूजा
2. दुर्गा अष्टमी
3. नवदुर्गा
4. दशहरा
5. गरबा
6. डांडिया

आदि निम्न तरीको से नवरात्रि का त्यौहार मनाया जाता है नवरात्रि का त्यौहार बहुत ही रोचक होता है इन दिनों ड्रामा और एतहासिक कहानियासुनाई जाती है जिसका प्रभाव माता रानियों से पड़ता है उन कहानियों में माता दुर्गा के रूपों को जानने का तात्पर्य होता है |मां जगदंबा के नौ रूप होने के कारण माता रानी को नौ दुर्गा भी कहा जाता है|

माता रानी को मां आदिशक्ति, भगवती भवानी तथा दुर्गा माता भी कहा जाता है| दुर्गा माता के रूपो का सनातन धर्म में वर्णन है क्योंकि यह नवरात्रि का त्यौहार हिंदुओं के लिए होता है यह त्यौहार भारत के विभिन क्षेत्रों व एशिया महाद्वीप में भी मनाया जाता है |जहां जहा हिन्दू होते है वहां वहां यह त्यौहार बहुत ही अच्छे से मनाया जाता है |

यह त्यौहार माता रानी की उपासना व उपवास रखकर तथा विधि विधान से पूजन करके मनाया जाता है| इस त्यौहार में रानी के नौ दुर्गा के स्वरूपों का वर्णन है जैसे – प्रथम शैलपुत्री द्वितीय ब्रह्मचारिणी तृतीय चंद्रघंटा चतुर्थ कुष्मांडा पंचम स्कंदमाता छठी कात्यायनी सातवीं कालरात्रि आठवीं महागौरी नवीं सिद्धिदात्री माता है इन सब देवियों का अपना अलग अलग इतिहास है परंतु ये सभी स्वरूप न जगदंबा के ही रूप है जिन्हें अवतार कहते है और सभी माताओं के अलग लग शस्त्र अस्त्र है तथा सभी माताओं के अपने अलग अलग वहां भी है |

1. शैलपुत्री

"नवरात्रि में नौ दुर्गा की पूजा विधि और दशहरा का महत्व"

“नवरात्रि में नौ दुर्गा की पूजा विधि और दशहरा का महत्व”

शैलपुत्री माता को पार्वती माता भी कहा जाता है क्योंकि पार्वती माता होने के लिए माता शैलपुत्री ने बहुत ही संघर्ष किया था| शैलपुत्री पर्वत राज हिमालय के घर जन्मी इस लिए इनका नाम शैलपुत्री रखा गया शैलपुत्री नौ दुर्गा के रूपो में प्रथम स्वरूप थी|

शैलपुत्री के जन्म के पहले की कहानी :

शैलपुत्री सर्वप्रथम प्रजापति दक्ष के यहां जन्मी थी इनका प्रथम नाम सती पड़ा था एक बार प्रजापति ने बहुत बड़ा यज्ञ का आयोजन किया जिसमें उन्होंने सभी देवी देवताओं गंधर्वों और अपने पिता ब्रह्मा और विष्णु को भी आमंत्रित किया परंतु उन्होंने अपने दामाद भगवान शंकर तथा अपनी पुत्री सती को नहीं बुलाया व आमंत्रित किया|

परंतु शैलपुत्री ने भगवान शंकर से जिद की और उन्होंने भी अपने पिता के यज्ञ में शामिल होने को कहा भगवान शंकर ने कहा हमे नहीं बुलाया हमारा जाना उचित नहीं होगा परंतु सती नहीं मानी और पिता के यज्ञ में जा पहुंची | वहां जाने पर उनकी मां के अलावा किसी से भी प्यार नहीं मिला ओर उनकी बहने तथा पिता ने सती के पति को खूब अपमानित किया|

जिससे सती को अंदर की आत्मा में चोट लगा और सती ने अपनी योग्यशक्ति से अपने आप को उसी यज्ञ में भस्म कर लिया | तभी भगवान शंकर बहुत ही क्रोधित हुवे और उन्होंने अपने बालों से वीरभद्र को प्रकट किया और उन्होंने वीरभद्र सहित +1000 गण को आदेश दिया जाओ प्रजापति के अहंकार भरे मस्तक व उनके यज्ञ को खंडित कर दो |

और प्रजापति का अहंकार भी टूटा और अपनी की गलती का अहसास हुआ भगवान शिव ने उन्हें माफ कर दिया था |  तथा सती का जन्म शैलपुत्री के रूप में पर्वत राज हिमालय के यहां हुआ | शैलपुत्री को वृषारूढ़ा के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इनका वाहन वृषभ है | तथा दाएं हाथ में त्रिशूल तथा बाएं हाथ में कमल सुशोभित है |

2. ब्रह्मचारिणी:

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ब्रह्मचारिणी माता नौ दुर्गा के स्वरूपों में से द्वितीय अवतार है |ब्रह्मचारिणी का अर्थ है ब्रम्ह+चारिणी अर्थात तपस्या का आचरण करने वाली तथा तप का आचरण करने वाली माता को ब्रह्मचारिणी माता कहा जाता है | नवरात्रि के दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी की पूजा, उपासना , व उपवास रखकर विधिविधान से व्रत किया जाता है |

शैलपुत्री माता को ब्रह्मचारिणी माता क्यों कहा जाता है ?

ब्रह्मचारिणी माता ही शैलपुत्री माता है | ब्रह्मचारिणी माता शिव को पाने के लिए अपने जीवन में माता ने कठोर तप किया जिस कारण माता को ब्रह्मचारिणी माता भी कहा जाता है |

ब्रह्मचारिणी माता ने नारद मुनि के कहने पर कठिन तप करने लगी माता रानी का तप बहुत ही कठिन था |माता रानी ने एक हज़ार वर्षों तक फल खाकर ही तपस्या की फिर उसके बाद तीन हज़ार वर्षों तक सूखे बेलपत्र खाकर तप किया परंतु माता ने हिम्मत नहीं हरि उसके बाद माता ने करीब 4 हज़ार वर्षों तक बिना कुछ खाए पिए तप किया जिसको निर्जल तप भी कहा जाता है |

ब्रह्मचारिणी माता के तप को देखकर सभी देवताओं ऋषि मुनियों ने देवी के ऊपर फूल गिराकर तथा देवी की खूब प्रशंसा की और आप ही इस संसार में ऐसा तप कर सकती है आप के शिवा ऐसा तप कोई नहीं कर सकता था | आप की मनोकामना जरूर पूरी होगी और आपका विवाह भगवान शंकर से ही होगा |

 

 

3. चंद्रघंटा:

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चंद्रघंटा माँ नौ दुर्गा के रूपों में से तृतीये स्वरुप है |चंद्रघंटा माँ को जो कोई भी पूजता हुई उसकी सारी मनोकामना पूरी होती है | चंद्रघंटा माता की साधना बहुत ही कल्याणकारी होती है | जो कोई भी सच्चे दिल से माँ की साधना करता है उसको अलौकिक व विशेष कोई धुन सुनाई देती है | चंद्रघंटा माता का यह स्वरुप बहुत ही शांति दायक और कल्याणकारी मन जाता है |

जो कोई भी माँ चंद्रघंटा की भक्ति करता है तथा उपासना व उपवास रखता है उसको परम शांति मिलती है जो 19 वी सदी के स्वन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु जी ने पंचमशील का सिधांत दिया था वह चंद्रघंटा माता की उपासना से ही नेहरु जी को प्राप्त हुआ था |

चंद्रघंटा माता का रूप बहुत ही सुंदर व अलौकिक है | मस्तक पर घंटे के आकर का अर्ध चन्द्र विराज होने के कारण माँ आदिशक्ति के इस स्वरुप को माँ चंद्रघंटा कहा जाता है | माता के चन्द्र के समान घंटे की कम्पन्न से असुर , राक्षस भयभीत हो जाते है | चंद्रघंटा माता अपनी सवारी सिंह को पसंद करती है तथा वह शेर पर सवार होकर राक्षसों का विनास करती है |

चंद्र घंटा माता के इस रूप से देवताओ तथा मनुष्यों में वीर रस का भाव उत्पन्न होता है | तथा माता के पूजने के साथ – साथ वे अपने अस्त्र सशस्त्र भी पूजते है क्योकि माता का यह स्वरुप असुरो के लिए बहुत ही भयावना होता है |

देवी का यह स्वरूप डर व निर्भीकता को दूर करता है और जो कोई भी सच्चे दिल से देवी को आराधना करता है वह बहुत ही शक्तिशाली हो जाता है | क्योंकि उस परम भक्त को देवी मां का आशीर्वाद मिलता है |

 

 

4. कुष्मांडा:

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कुष्मांडा मां नौ दुर्गा की चतुर्थ अवतार है | यह अवतार बहुत ही अत्यंतकारी है जो कोई भी सच्चे दिल से माता कुष्मांडा की आराधना व पूजता है उसकी सारे मनोकामना मां कुष्मांडा करती है |

मां कुष्मांडा ने ही सृष्टि का निर्माण किया था | जब चारों ओर अंधकार ही अंधकार था तब मां ने इस सृष्टि का निर्माण किया | और सभी लोगों को अपने आंड से प्रकट किया तथा एक बहुत ही सुन्दर ब्रह्माण्ड का निर्माण कर व चारों ओर सुंदरता से भर दिया | कुष्मांडा माता के आठ हाथ होने के कारण माता को अष्टभुजा माता के नाम से भी जाना जाता है |

कुष्मांडा माता को कुम्हड़ा बहुत पसंद है तथा कुम्हड़ा को संस्कृति में कुष्मांडा कहा जाता है | इसलिए माता का नाम कुष्मांडा पड़ा | और माता को कुम्हड़ा की बलि दी जाती है |

कुष्मांडा माता की विधिविधान से पूजा व आराधना , उपासना और उपवास रखकर व्रत के माध्यम से सच्चे दिल से पूजा करने से माता प्रसन्न होती है | तथा अपने भक्तों को सुख समृद्धि प्रदान करती है | हमेशा माता कुष्मांडा उनकी रक्षा करती है |

 

 

 

 

5. स्कंदमाता:

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स्कंदमाता माता मां नौ दुर्गा के पंचम अवतार है | स्कंदमाता स्वयं एक पर्वत पर वास करने वाली माता है | स्कंदमाता की जो कोई भी सच्चे दिल से वंदना , आराधना , साधना करता है | तथा माता के लिए उपासना कर व्रत रखता है उसकी सारे मनोकामना पूर्ण होकर वह मोक्ष के लिए प्रस्थान करता है |स्कंदमाता उसकी हमेशा रक्षा करती है |

स्कंदमाता के चार भुजाएं है एक भुजा में स्कंद को गोद लिए हुवे है तथा दूसरी भुजा में कमल का पुष्प लिए हुवे है | स्कंदमाता कमल के पुष्प पर बैठती है इसलिए माता को पद्मशना भी कहा जाता है |उनकी पूजा से मोक्ष का मार्ग भी खुल जाता है | स्कंदमाता विद्वानों और सेवकों को प्रकट करती है | यानी माता जगदंबा के इस स्वरूप ने चेतना का का निर्माण करती है |

 

 

 

6. कात्यायनी:

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मां कात्यायनी देवी दुर्गा ने नौ स्वरूपों में से छठी अवतार है  कात्यायनी माता की जो कोई भी आराधना, साधना , सच्चे दिल से भक्ति करता है और उपासना व उपवास रखकर व्रत को विधिविधान से पूरा करता है उसके सारे पाप नष्ट हो जाते है तथा वह काम , मोक्ष , अर्थ और धर्म चारों फलों की प्राप्ति करता है |

मां कात्यायनी के व्रत से पुत्र और पुत्री की प्राप्ति भी होती है मां कात्यायनी का जन्म विश्व प्रसिद्ध महर्षि कात्यायन के कठिन संघर्ष व घोर तपस्या से माता भगवती परम्बा प्रसन्न हुई और महर्षि के यहां पुत्री के रूप में स्वयं जन्मी इस कारण माता का नाम कात्यायनी पड़ा |

मां कात्यायनी सिंह की सवारी करती है  तथा भक्तों के रोग, दोष, व सभी प्रकार की बीमारी हर लेती है  तथा अपने भक्तों की स्वयं सुरक्षा करती है  इसलिए कहा जाता है कि माता की आराधना से परम सुख की प्राप्ति होती है |

 

 

 

 

7. कालरात्रि:

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कालरात्रि माता माता दुर्गा के नौ स्वरूपों में से सातवीं अवतार है माता कालरात्रि के इस स्वरूप से राक्षस डर जाते है  और माता काल रात्रि का जस नाम है वैसे ही माता का काम भी है  माता रानी के रूप से असुर राक्षस और भूत प्रेत दूर भाग जाते है माता कालरात्रि अपने भक्तों के लिए बहुत प्रेम से रक्षा करती हैं |

कालरात्रि का स्वरूप बहुत ही कला है  तथा बाल घने हुवे है और गले में विद्युत से भी ज्यादा चमक वाली माला पहने हुई है l तथा अपने भक्तों के लिए बिल्कुल ही कोमलता से दर्शन देती है  और जो कोई भी माता कालरात्रि की उपासना व साधना सच्चे दिल से करता है उसको भूत प्रेत और तमाम काली शक्तियों से दूर रहता है| और माता रानी उनकी सभी मनोकामना पूरी करती है |

 

 

8. महागौरी:

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“नवरात्रि में नौ दुर्गा की पूजा विधि और दशहरा का महत्व”

महागौरी माता देवी नौदुर्गा की आठवीं अवतार है  महागौरी माता की आराधना से सारे पाप धुल जाते है  माता गौरी माता गंगे से भी ज्यादा पवित्र है  माता गौरी का शरीर पूरी तरह गोरा और श्वेत है इस लिए माता का नाम महागौरी पड़ा |

माता गौरी की कहानी:

माता गौरी शिव की चाह के लिए घोर तपस्या की तपस्या के दौरान माता का रंग काला हो गया और शरीर भी ढल गया परंतु तपस्या से खुश होकर भगवान शंकर ने माता को गोरा कर दिया और माता महागौरी हो गई तभी से माता को महागौरी कहा जाता है  माता का वाहन वृषभ है  इसलिए माता को वृषारूढ़ा माता भी कहा जाता है और श्वेत होने के कारण माता को श्वेतांबर धारण माता भी कहा जाता है  माता के चार भुजाएं है एक भुजा में डमरू , त्रिशूल और अभय मुद्रा में हाथ है |

जो कोई भी माता की उपासना सच्चे दिल से करता है उसकी सारी मनोकामना पूरी होती है | और साथ ही कोई भी स्त्री माता गौरी की उपासना और उपवास रख सच्चे दिल से व्रत करता है  मातारानी in सभी स्त्री के सुहाग की स्वयं रक्षा करती है

 

 

9. सिद्धिदात्री:

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सिद्धिदात्री माता देवी नौदुर्गा की नवीं व अंतिम अवतार है सिद्धिदात्री माता का नाम ही सिद्धि से है  माता रानी की जो कोई भी सच्चे दिल से आराधना व साधना और उपवासना और उपवास रखकर व्रत करता है उसकी सारी मनोकामना तो पूरी ही होती है परंतु उसको सुख की प्राप्ति और तमाम सिद्धियां भी प्राप्त होती है |

माता रानी सिद्धिदात्री के चार भुजाएं है  कमल, त्रिशूल, गदा ,चक्र से सुशोभित है और शेर के ऊपर सवारी करती है जिससे लोग उनको शेरवहिनी भी कहते है | सिद्धिदात्री माता की उपासना से सारी देवी प्रसन्न हो जाती है सिद्धिदात्री माता के उपवास से अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व आठ सिद्धियां भी प्राप्त होती है  माता रानी की आराधना से कठिन से कठिन काम भी सफल हो जाते है |

 

 

नवरात्रि के नवरंग:

सोमवार सफेद रंग
मंगलवार लाल रंग
बुधवार हरा रंग
गुरुवार कच्चा पीला व हार्डी वाला रंग
शुक्रवार गुलाबी या चमकदार व दूधिया रंग
शनिवार नीला आसमानी व जमुनी रंग
रविवार केसरी रंग

माता भगवती भवानी के नौ रूपो का महत्व:

1. शैलपुत्री माता इस संसार में संपूर्ण जड़ पदार्थ व जल , अग्नि , वायु , मिट्टी, आकाश को जन्म देती है और सभी को व्यवस्थित करती है  शैलपुत्री माता आदि शक्ति की प्रथम रूप है  और शैलपुत्री माता पृथ्वी पर हर कण कण में वास करती है |

2. ब्रह्मचारिण माता तमाम शक्तियों की माता है  ब्रम्हचारी जीवन से जो कोई भी जुड़ जाता है वह ब्रह्मचारिणी माता से जुड़ जाता है  ब्रह्मचारिणी माता का अर्थ है जड़ और चेतन शरीर को मन को ध्यान में लगाना और ईश्वर से जुड़ जाना ब्रह्मचारिणी माता के तप से आता है | और बहुत मन शांत भी रहता है इसलिए मन को तप में जरूर लगाना चाहिए |

3. चंद्रघंटा माता जीवी में प्रबल शक्ति जाग्रत करती है  था माता आदिशक्ति की तीसरी अवतार है माता जीवो में वाणी को प्रदुभाव करती है इसलिए माता चंद्रघंटा सुरों की देवी है |

4. कुष्मांडा माता का अर्थ है अंडों को धारण करने वाली अर्थात स्त्री और पुरुषों के गर्भधारण, गर्भाधान की शक्ति है  स्त्री और पुरुष में जो प्रेम का भाव उठता है वह देवी कुष्मांडा की शक्ति से उठता है |

5. स्कंदमाता का अर्थ है कि इस संसार में जो कोई भी पुत्रवती माता पिता का स्वरूप है अर्थात् प्रत्येक पुत्रवान माता पिता स्कंद माता के रूप है |

6. कात्यायनी माता भगवती माता की कन्या है और देवी आदिशक्ति माता की छठी अवतार है |

7. कालरात्रि माता देवी नौदुर्गा की सातवीं रूप है इस संसार में जड़ चेतन के समान सभी को मृत्यु आती है  मृत्यु के समान देवी के भक्त को माता कालरात्रि के दर्शन होते है |

8. महागौरी माता देवी आदिशक्ति की आठवीं अवतार होने के कारण इस संसार को शांति और सुख प्रदान करती है |

9. सिद्धिदात्री माता देवी नौ दुर्गा की नवीं अवतार हैं , सिद्धिदात्री माता का यह अवतार आखिरी व अन्तिम है  सिद्धिदात्री माता ज्ञान व बोध का प्रतीक है | सिद्धिदात्री माता के व्रत से सभी देवी प्रसन्न हो जाती है  माता के पूजन साधना से सारे सिद्धियां प्राप्त होती हैं|

सिद्धिदात्री माता स्वयं शक्ति है और शंकर भी हो जाती है  इसलिए शंकर भगवान अर्धनारीश्वर कहलाए जाते है  क्योंकि शंकर में माता पार्वती भी बसती है और दोनों लोग एक हो जाते हैं |

देवी नौदुर्गा आयुर्वेद की शक्ति है :

सभी माताओं में अपनी अपनी शक्ति है  माता रानी की कृपा से सभी रोग मिट जाते है माता रानी के जप से रोग और दर्द सब जड़ से खत्म हो जाते है | माता रानी के नाम से औषधियां है जो रोग , चर्म, दर्द, तमाम प्रकार की बीमारी दूर करती है |

महागौरी माता के नाम से तुलसी की उत्पति होती है तुलसी सात प्रकार की होती है  तुलसी से पेट की बीमारी व स्वास में मदद करती है  तुलसी की चाय मन को अतिआनंद देती है | कुष्मांडा माता को कुम्हड़ा पसंद है और कुम्हड़ा से पेठा बनता है जो कि खाने मीठा और पेट की बीमारी भी दूर करती है |

निष्कर्ष:

नवरात्रि में नौ दुर्गा की पूजा

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नवरात्रि से नौ दुर्गा और दुर्गापूजा का वृतांत बहुत ही सुन्दर और अलौकिक है। नवरात्रि से दुर्गा माता की कहानी प्रारंभ हो जाती है यह धार्मिक और सांस्कृतिक पर आधारित है  माता की कहानी हमे सिखाती है कि इस पूरे ब्रह्माण्ड का जन्म माता आदिशक्ति से हुआ है और सफलता के पीछे माता का हाथ होता है |

नवरात्रि हिन्दुओं का त्यौहार है परंतु माता जगदंबा सभी लोगों की माता होती है | माता जगदंबा कोई और नहीं बल्कि हर घर स्वतंत्र रूप से उपस्थित होने वाली माता है हर किसी भी पुत्र की माता ही जगदंबा है | और सभी घर में मां होती है जो सबका ख्याल रखती है  और अपने पुत्र– पुत्री को ममता देती है  और खुद भूखी रहकर अपने बच्चे का ख्याल रखती है और हमेशा अपने बच्चों के लिए छत बनकर खड़ी रहती है|

इस पूरे ब्रह्माण्ड में खुद की माता से बढ़कर कोई ऐसी माता नहीं है  माता जगदंबा का ही रूप होती है  मां या मम्मी हर पुत्र अपनी माता को किसी न किसी नाम से पुकारते है | मां ही जगदंबा है ना ही भवानी है मां ही आदिशक्ति है मां ही देवी नौ दुर्गा के स्वरूप है मां ही इस संसार की दीवार है  और नवरात्रि और दुर्गापूजा के बाद दशमी के दिन होने वाला त्यौहार दशहरा है  दशहरा के दिन कहा जाता है श्री राम ने रावण जैसे बहुत शक्तिशाली राक्षस का वध किया था |

इस लिए इस त्यौहार में विजय जीत सत्य का प्रतीक माना जाता है  हर पिता अपने बच्चों के लिए किसी भी असत्य और अधर्म से लड़ सकता है और उस अधर्म को पराजित करता है  वो अधर्म और कुछ नहीं बस जीने के लिए धन रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और सुख समृद्धि का घर है और इन सभी लाभों को पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है  और जब हासिल हो जाते है तो यही जीत है और सब धर्म में परिवर्तित हो जाता है क्योंकि इसके लिए कठिन परिश्रम और मेहनत करना पड़ता है |

सारांश:

इस पूरे लेख में नवरात्रि से जुड़ी कथन और देवी नौ दुर्गा के सभी रूपो का वर्णन है , और दुर्गापूजा दशहरा जैसे त्यौहार का भी सरल शब्दों में विस्तार से बताया गया है|

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