देवों के देव: महादेव
भगवान से सिर्फ एक देवता नहीं, “भावना” हैं। हिंदू धर्म में उन्हें सबसे पुराना और सबसे प्यारा माना गया है। जहां ब्रह्मा जी दुनिया को बनाते हैं और विष्णु जी उसे चलाते हैं, वही शिव जी “सर्वकालीन महान” की तरह अंत में शब्द संभाल लेते हैं जिन्हें “संहारकर्ता” भी कहते हैं तक नई शुरुआत हो सके।
“देवों के देव महादेव: शिव के जन्म का रहस्य, उनके नाम और महिमा का संपूर्ण सार”

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महादेव के अद्भुत नाम:
लोग उन्हें प्यार से भोलेनाथ कहते हैं क्योंकि वह एक लोटा जल से भी खुश हो जाते हैं। लेकिन जब गुस्सा आता है, तो वे “रुद्” बन जाते हैं। रुद्र का अर्थ है कि भावात्मक शक्तिशाली जो रूला के संसार का नाश कर दें वो कोई और नहीं स्वयं महादेव हैं। उनके नाम इतने हैं कि गिनते गिनते शाम हो जाए— शंकर , महाकाल, नीलकंठ, आशुतोष, महेश और वे जितनी सरल योगी हैं, उतने ही भयंकर शक्तिशाली काल भैरव भी हैं।
महादेव का कोई महल नहीं बल्कि बर्फ से ढका कैलाश पर्वत है जहां पर भगवान शंकर और माता पार्वती तथा उनके अनुयाई है रहते हैं। कहां जाता है की माता पार्वती के बिना उनकी शक्ति और वह स्वयं अधूरे हैं उनके परिवार में टैलेंट की कमी नहीं है क्योंकि उनके बेटे कार्तिकेय, गणेश और अध्यपा जैसे वीर पुत्र है, तो अशोक सुंदरी, ज्योति और मनसा देवी जैसी प्यारी पुत्रियां भी है।
भगवान शंकर का लुक बहुत ही प्रतिभाशाली , प्रभावशाली, अद्भुत व डरावना दिखता है। उनके गले में लिप्त नाग देवता जिनका नाम “वासुकी” हाथ में डमरू और त्रिशूल, और माथे पर चमकता चंद्रमा। वे एक ऐसे योगी हैं जो भस्म भी लगाते हैं और पूरी दुनिया को अपनी लय पर भी नचाते है।
महादेव जी की खास बात यह है कि उनकी पूजा ” मूर्ति” मैं भी होती है और “शिवलिंग” मैं भी होती है जो की एक ऊर्जा का प्रतीक है। वे तंत्र साधना करने वालों के लिए “भैरव” हैं और वेदों को मानने वालों के लिए “रूद्र” हैं।
आईए हम लोग जानते है, सोमवार वाले “सुपरहीरो”: हमारे प्यारे भोले बाबा!
अगर आप लोग भारत की मिट्टी से जुड़े है, तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि आपने “बम बम भोले” का नारा न सुना हो। हफ्ते का पहला दिन यानी सोमवार, सीधे महादेव के नाम को अर्पित होता है। चलिए जानते है, उन देव के बारे में जिनका स्वैग सबसे निराला है।
एक नाम, अनेक काम
वैसे तो इन्हें बुलाने के लिए “महादेव” नाम ही काफी है, लेकिन इनके भक्त इन्हें न जाने कितने प्यारे और निराले नामों से पुकारते है—
. महाकाल: जो समय के भी बाप है, जिन्हें कहा जाता है, कालों के काल महाकाल
. नीलकंठ: जिन्होंने दुनिया बचाने के लिए जहर पीलिया और गले को नीला कर लिया इसलिए इनका नाम नीलकंठ पड़ गया।
. भोलेश्वर: जो इतनी सिंपल हैं कि बस एक लोटा पानी चढ़ा दो, तो आपकी हर इच्छाएं पूरी कर दें।
. रामेश्वर: त्रेता युग में भगवान राम ने भोलेनाथ को रामेश्वर कहकर पुकारा मतलब राम के आराध्य रामेश्वर इनके अनगिनत नाम है, जिनमें कालभैरव, शंकर, जैसे अनेक नामो से जाना जाता है।
त्रिदेव और तीसरी आंख का राज
दुनिया कहती है भगवान शंकर देवों के देव है। क्यों? क्योंकि वह ही इस ब्रह्मांड के असली निर्माता और प्रबन्धन है।
एक मजेदार बात: महादेव को “त्रिदेव” किस श्रेणी में गिना ही जाता है, लेकिन उन्हें “त्रिनेत्र” भी कहते हैं। उनकी तीन आंखें सिर्फ स्टाइल नहीं है बल्कि दो आंखें इस भौतिक दुनिया को देखती है, और तीसरी आंख ज्ञान की आंख जब खुलती है, तो बुराई का नामोनिशान मिटा देती है।
महादेव: आरंभ भी, अंत भी
ब्रह्मांड की हर ईट इन्हीं के इशारे पर लगी है और जब प्रलय आता है, तो इन्हीं के तांडव पुरानी चीजों को मिटाकर नई दुनिया का रास्ता साफ करता है। यानी महादेव आरंभ भी है, और अंत भी है।
महादेव को समझना हो तो बस इतना जान लीजिए कि वे “ऑल इन वन” है! एक तरफ वह इतने शांत और मधुर दिखते है कि छोटा बच्चा भी उनसे लिपट जाए, तो दूसरी तरफ जब वह रौद्र रूप धरते हैं, तो पूरी दुनिया थर थर कांपने लगती है। इसलिए तो उन्हें सिर्फ देव नहीं, बल्कि देवों के देव महादेव कहा जाता है।
दुनिया में सब कुछ इन्हीं से शुरू होता है, इन्हीं में चलता है और अंत में इन्हीं में जाकर समा जाता है। वे ब्रह्मांड के वो “सर्वोपरि” बॉस है, जो संहार यानी पुनः तैयार करना और खत्म करने की शक्ति रखते है।
शिव का मतलब है “कल्याण” लेकिन वह प्रलय को भी अपनी मुट्ठी में रखते हैं। उनकी सबसे मजेदार बात पता है क्या? उनकी अदालत में कोई भेदभाव नहीं होता। जहां एक तरफ मर्यादा पुरुषोत्तम राम उनके परम भक्त हैं, वहीं दूसरी तरफ विद्वान रावण भी उनका ही बावला, दीवाना था। शनि देव हो या कश्यप ऋषि, महादेव की कृपा सब पर बराबर बरसती है क्योंकि वे सबको एक ही नजर से देखते हैं।
उन्हें लोग ना जाने कितने सरल और कठिन नाम से पुकारते हैं! कोई उन्हें “मृत्युंजय” कहता है क्योंकि उन्होंने मौत को भी हरा दिया, तो कोई उन्हें “चंद्रशेखर” कहता है क्योंकि उनके सिर पर चांद चमकता है। वे “जटाधारी” भी हैं और गले में सांप होने की वजह से “विषधर” भी। भूत प्रेतों के राजा होने के नाते उन्हें “भूतनाथ” पुकारा जाता है, तो माता पार्वती के साथ होने पर वे “उमापति” बन जाते हैं। शिव की कथा ही पूरी तरह अलौकिक और अकल्पनीय है।
राम और महादेव: एक ही सिक्के के दो पहलू
महादेव और श्री राम के बीच कोई दीवार नहीं है, खुद राम जी कहते हैं कि जो हम दोनों में फर्क करता है, वह हममें से किसी का प्यार नहीं हो सकता। असल में, आपके आसपास जो कुछ भी है सूर्य की रोशनी, बारिश की बूंदे, हरे भरे पेड़, हवा और यहां तक कि आपकी थाली का खाना यह सब महादेव जी के ही अलग-अलग रंग रूप है। वे सूरज बनकर ऊपर से सब देखते हैं और हमारे कर्मों का लेखा-जोखा तैयार करते हैं।
सीधा सा हिसाब है अगर आपकी बुद्धि, और आप नेक इंसान है, तो महादेव आपको सुख, सेहत, ऊर्जा, शक्ति और धन की बारिश से प्रदान करेंगे। लेकिन अगर दिमाग में खुराफात भरी है, तो फिर समझ लीजिए कि दुख और बीमारियों वाला उपहार भी उन्हीं के फाइल से आता है।
यानी पूरी दुनिया शिव का ही एक बड़ा सा प्लेग्राउंड है, जहां जैसा खेलोगे, वैसा ही इनाम मिलेगा। इसका अर्थ है कि “मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम” नेक इंसान और कर्तव्य पूर्ण थे वहीं दूसरी ओर उनका परम भक्त “रावण” दुरकर्मी और नारी, ऋषियों और मानव पर अत्याचार करने वाला था, इसलिए भगवान् शंकर ने युद्ध में रावण का साथ नहीं दिया था।
महादेव का जन्म:
महादेव इन्हें भगवान शिव भी कहा जाता है। भगवान शिव के जन्म का विषय थोड़ा अलग और रहस्यमय है, क्योंकि शिव को सामान्य अर्थों में जन्म लेने वाला देव नहीं माना जाता। शास्त्रों और पुराणों में उन्हें अजन्मा, अनादि और ईश्वर तथा अनंत कहा गया है। फिर भी अलग– अलग शास्त्रों में उनकी आगमन की कथा या प्रकट होने की कथा मिलती है।
आईए आपको शिव के जन्म की कथा अलग –अलग ग्रंथों के लेखा जोखा से बताया जाएं —
. महादेव का यथार्थ स्वरूप
भगवान शंकर को
. अजन्मा (जिनका जन्म नहीं हुआ)
. अनादि ( जिनकी कोई शुरुआत नहीं)
. अनंत (जिनका कोई अंत नहीं)
कहा गया है।
अर्थात महादेव संसार से पहले भी थे, संसार के दौरान भी है, और अंत के बाद भी रहेंगे। (Mahadev was there before, is there now and will remain there in the future too) वे किसी माता-पिता से जन्मे नहीं, बल्कि स्वयं से प्रकट होने वाले परम तत्व हैं।
. महादेव का प्रकट होने की कथा: ब्रह्मा – विष्णु विवाद की कथा
शिव पुराण और लिंग पुराण के अनुसार—
एक बार ब्रम्हा और विष्णु में यह विवाद हुआ कि सृष्टि में श्रेष्ठ कौन है। इसी विवाद के समय अचानक एक अत्यंत विशाल, और चमकदार स्तंभ (ज्योतिर्लिंग) प्रकट हुआ, जिसका न तो आदि दिखता था और न अंत।
. विष्णु वराह रूप में नीचे की और गए
. ब्रम्हा हंस रूप में ऊपर की और गए लेकिन दोनों ही उसकी सीमा पा नहीं पाएं तभी (ज्योतिर्लिंग) से आवाज आई “मैं हीं वह परम सत्य हूँ जिसका न अनादि है, न ही अंत” यही शिव का अलौकिक प्राकट्य माना जाता है, न कि जन्म।
. भगवान विष्णु के तेज से प्रकट होने की मान्यता
कुछ पौराणिक कथाओं में यह वर्णन मिलता है कि —
. ब्रह्मा विष्णु के नाभि से पैदा हुवे है
. ब्रह्मा विष्णु के विवाद के समय विष्णु के मस्तक के तेज से रुद्र रूप प्रकट हुआ यह रुद्र ही आगे चलकर महादेव शिव के रूप में प्रतिष्ठित हुवे। यह कथा शिव भगवान् शंकर के प्रकट होने को दर्शाती है, ना की जैविक जन्म को।
. महाशिवरात्रि: शिव का प्राकट्य दिवस
इस अलौकिक घटना के स्मृति में फागुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि मनाई जाती हैं।
मान्यता है कि इसी रात्रि:
. भगवान शंकर ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए
. उन्होंने स्वयं को सृष्टि के परम सत्य के रूप में प्रकट किया इसलिए महाशिवरात्रि को महादेव का जन्मदिन नहीं, बल्कि शिव तत्व के प्रकट होने का दिवस माना जाता है।
शिव क्यों अजन्मा कहलाते है?
क्योंकि —
. वे काल से परे हैं
. वे सृष्टि के नियमों में बंधे नहीं हैं
. वे संहारकर्ता होते हुए भी सृजन के मूल कारण है इसलिए कहा जाता है “ना उनका जन्म हुआ, ना उनकी कभी मृत्यु होगी”!
शिव पुराण के अनुसार, सृष्टि की उत्पत्ति के समय केवल “ब्रह्म” निराकार परमेश्वर था। उसे निराकार ब्रह्म ने अपनी शक्ति से एक साकार रूप धारण किया, जिसे “सदाशिव” कहा जाता है। सदाशिव और उनकी शक्ति आदि शक्ति अंबिका के मिला से ही ब्रह्मा, विष्णु, और महेश (रुद्र) की उत्पत्ति हुई। इस दृष्टि से: महादेव रूद्र रूप में सदाशिव और “पराशक्ति” के अंश माने जाते हैं।
ब्रह्मांड के पहले मोटिवेशनल गुरु: रुद्र से शिव बनने का सफर
सतयुग से लेकर आज के कलयुग तक, इतिहास के पन्नों में सिर्फ एक ऐसा ही चेहरा है जिनके माथे पर ज्ञान की अद्भुत ज्योति चमकती है और वो है हमारे महादेव! उन्होंने एक इंसान की तरह जीवन की कर हमें वेदों का वो “गुप्त” ज्ञान दिया, जो आज भी हमारे जीवन की हर समस्या का सबसे बड़ा हल हैं।
सीधी बात यह है कि “वेद ही शिव है और शिव ही वेद” महादेव ने हमें सिखाया है कि कैसे अपनी भीतर की आग और गुस्से को शांत करके, ज्ञान के जरिए खुद को एक कल्याणकारी और शांत इंसान में बदला जा सकता है। यानी, अगर आपके पास सही ज्ञान है, तो आप भी अपनी कमियों को जलाकर महादेव की तरह महान बन सकते हैं।
महादेव के नंदी गण
1. नंदी
2. भृंगी
3. रिति
4. टुंडी
5. श्रृंगी
6. नंदीकेश्वर
7. बेताल
8. पिशाच
9. तोतला
10. भूतनाथ
महादेव की अष्टमूर्ति
1. पृथ्वीमूर्ति — शर्व
2. जलमूर्ति — भव
3. तेजमूर्ति — रुद्र
4. वायुमूर्ति — उग्र
5. नभमूर्ति — भीम
6. अग्रिमूर्ति — पशुपति
7. सूर्यमूर्ति — ईशान
8. चंद्रमूर्ति — महादेव
शिवरात्रि की पूजा कैसे करी जाती है?
शिवरात्रि की पूजा पूरी रात चारों प्रहर में की जाती है, क्योंकि यही वह समय है जब शिव तत्व सबसे अधिक जागृत माना जाता है। महादेव को बेलपत्र, पुष्प और चंदन अत्यंत प्रिय है। भक्त उन्हें दूध, दही, घी, शहद और चीनी से बने पंचामृत से नहलाते है, जिस मां और आत्मा दोनों शुद्ध होते हैं।
शिव के हाथों का त्रिशूल और डमरू की पावन गंज मंगल और गुरु जैसे शुभ ग्रहों की कृपा का संकेत मानी जाती है। उनके मस्तक पर विराजमान चंद्रमा अपनी शीतल कांति से पूरे ब्रह्मांड को शांति देता है, जिससे अन्य ग्रह भी संतुलन में रहते हैं।
महामृत्युंजय मंत्र शिव भक्ति का सबसे प्रभावशाली , शक्तिशाली मंत्र माना गया है। वही सावन के सोमवार और महाशिवरात्रि का व्रत श्रद्धा से करने पर सभी मनोकामनाओं की पूर्ति और जीवन में कल्याण की अनुभूति प्रतीत होती है।
महादेव की पूजा में कौन सी समान वर्जित है?
महादेव , भगवान शिव को श्रृंगार की वस्तुएं (हल्दी, मेहंदी, कुमकुम, सिंदूर), शंकर से जल, तुलसी के पत्ते, नारियल पानी, केतकी और कमल के फूल, और किसी को कष्ट पहुंचाना या छल कपट पसंद नहीं है, वे बैराग्य, सादगी और सत्य का प्रतीक है, इसलिए दिखावा और गलत कर्म उनसे दूर रहते हैं जो की कष्टदाई है।
महादेव को नटराज क्यों कहा जाता है?
जब बात डांस की हो, तो महादेव से बड़ा कोई नहीं! उन्हें “नटराज” कहा जाता है क्योंकि वे तांडव के शौकीन है मानव में ब्रह्मांड की सबसे पहले और सबसे शक्तिशाली या पावरफुल डांसर हो। लेकिन क्या आप जानते हैं कि “शिव” नाम का मतलब क्या है? शिव का अर्थ ही है सबका भला करने वाला, दयालु और एकदम प्यारा मित्र।
अगर इसे शब्दों में तोड़े तो “शि” का अर्थ है जिसमें पूरी दुनिया समय हो, और “वा” वह का मतलब है कृपा की मूरत। पुराने वेदों में “शिव” का इस्तेमाल किसी की तारीफ करने (विशेषण) के लिए किया जाता था, जैसे आज हम किसी को सुपर, अमेजिंग या स्मार्ट कहते है। धीरे-धीरे यही शब्द हमारे प्यारे महादेव का पक्का नाम बन गया।
वे ऐसे “ऑलराउंडर” भगवान है जो दुनिया को बनाते भी हैं, उसे प्लेट भी हैं और जरूरत पड़ने पर पुराने को हटाकर नए भी करते हैं इसलिए उन्हें संघार करता भी कहते है, सीधा सा मतलब यह है कि शिव मतलब “मुक्ति” और शिव मतलब हर वह चीज जो “शुभ” है।
महाशिवरात्रि: शिव — पार्वती विवाह और शिवलिंग का प्रकट होना
यूं तो हर महीने एक शिवरात्रि आती है, जिसे हम “मासिक शिवरात्रि” कहते है, लेकिन फागन महीने वाली रात असली “महाशिवरात्रि” हैं। यह दिन इतना स्पेशल क्यों है? क्योंकि इसी दिन पहली बार ब्रह्मा जी और विष्णु जी ने शिवलिंग की पूजा की थी और इसी शुभ महूर्त दिन पर महादेव और माता पार्वती की शादी हुई थी। खुद शिवजी ने इस दिन को वरदान दिया है कि जो भी इस रात जागेगा और उनकी पूजा करेगा, उसे जीवन के सारे सुख और मोक्ष मुक्ति दोनों मिलेंगे।
शास्त्रों के अनुसार, महादेव आधी रात को करोड़ों सूरज की चमक वाले “शिवलिंग” के रूप में प्रकट हुए थे, इसलिए इस व्रत में आधी रात की पूजा का बड़ा महत्व है। कहते हैं इस रात पूजा करने से उतना पुण्य मिलता है जितना बड़े-बड़े यज्ञ करने से भी नहीं मिलता।
सर्दियों की विदाई और सकारात्मक ऊर्जा का केंद्र
वैज्ञानिक और आध्यात्मिक नजरिए से देखे तो महाशिवरात्रि बसंत ऋतु के स्वागत का समय है। इस समय चंद्रमा थोड़ा कमजोर होता है, जिससे आसुरी यानी नेगेटिव शक्तियां बढ़ाने की कोशिश करती हैं। ऐसे में “महाकाल” की पूजा एक सुरक्षा की तरह काम करती है जो हर अनिष्ट को खत्म कर देती है। यह वह समय है जब प्रकृति खिलती है और मन में उमंगे जागती है, ऐसे में महादेव (जिन्होंने खुद कामदेव को जीता है) की भक्ति हमें भटकने से बचाती और सही मार्ग दिखाती हैं।
चाहे आपकी राशि कोई भी हो, बस 12 ज्योतिर्लिंगों का नाम लेने या दर्शन करने पर से आपकी लाइफ में सकारात्मक ऊर्जा, शक्ति , सामर्थ व हर अच्छी आदतें आपके अंदर प्रवेश कर जाती है। इसलिए कहा जाता है की महाशिवरात्रि का व्रत सच्चे मन से रखने पर सभी इच्छाएं की पूर्ति, व सकारात्मक ऊर्जा का ज्ञान मिलता है।
महाशिवरात्रि: शिव –शक्ति का मिलन
महाशिवरात्रि सिर्फ एक हिन्दुओं का उत्सव नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे महान ” प्रेम गाथा” के मुकम्मल होने का दिन है। यह फागन महीने की वो जादुई रात है, जब माता पार्वती की बरसों की कड़ी तपस्या रंग लाई और उन्हें पति के रूप में स्वयं स्वयंभू महादेव मिले। आध्यात्मिक तौर पर देखे तो यह ” प्रकृति” और “पुरुष” मतलब शिव और शक्ति और “अर्धनारीश्वर” होने का एक जश्न है।
क्या आप जानते हैं? आज शादियों में दूल्हा दुल्हन जो सात वचन लेते हैं, उनकी शुरुआत भी शिव पार्वती के इसी पवित्र विवाह से हुई थी। महादेव के बारे में सबसे अनोखी बात यह है कि उनका कोई “जन्मदिन” नहीं होता, क्योंकि वे अजन्मा है यानी वह हमेशा से थे और हमेशा रहेंगे।
पूरे भारत में तथा हिंदुओं वाली आबादी वाले देशों में इस दिन लोग नाचते गाते और खुशियां मनाते हैं, क्योंकि उनके “भोले बाबा” दूल्हा बने थे। महाशिवरात्रि का प्रतीक “रात अंधेरे पर उजाले और निस्वार्थ प्रेम की जीत का सबसे बड़ा उत्सव है”।
शिव महापुराण: महादेव की जादुई गाथा और “नीलकंठ” बनने का रहस्य
अगर आपको महादेव को करीब से जानना है, तो “शिव महापुराण” उनके जीवन की सबसे बड़ी जीवनी हैं। इसमें 12 खंड मतलब संहिताएं हैं, जिम शिव जी की चमत्कारी लीलाओं और उनके जीवन की हर छोटी बड़ी घटना को विस्तार से बताया गया है।
इस पुराण में वह मशहूर कहानी भी है, जब समुद्र मंथन के दौरान एक ऐसा भयंकर जहर विष निकला जो पूरी दुनिया को पल भर में राख कर सकता था। जब सब घबरा गए, तब महादेव “महानायक” बनकर आए और उन्होंने उस विष को खुद पी लिया। लेकिन उन्होंने उसे शरीर के अंदर नहीं जाने दिया, बल्कि अपने गले कंठ में ही रोक लिया।
उसे जहर की गर्मी से उनका गला नीला पड़ गया और तभी से पूरी ब्रह्मांड उन्हें प्यार और सम्मान से “नीलकंठ” कहकर पुकारने लगी। शिव पुराण हमें यह सिखाती है कि दूसरों की भलाई के लिए कड़वा घूट पीना ही असली महानता है।
मानसरोवर: जहां बसते है महादेव
भक्तों की माने तो महादेव का अपना “स्थाई स्थान” बर्फ से ढका हुआ खूबसूरत कैलाश सरोवर है। वही एकांत में बैठकर वे पूरी दुनिया का ध्यान रखते हैं। लेकिन महादेव सिर्फ एक रूप में नहीं बंधे हुवे है, वे तो पल-पल में अपना रंग बदलते रहते हैं।
जब दुनिया में प्रलय का समय आता है और सब कुछ खत्म होने लगता है, तब वे “निराकार ब्रह्म” बन जाते हैं यानी एक ऐसी शक्ति जिसका कोई आकार नहीं, बस एक अलौकिक ज्योति है। उत्तराखंड के पहाड़ों में लोग उन्हें प्यार से “निरंकार देवता” के रूप में पूजते हैं।
और जब बात न्याय करने की या बुराई को सबक सिखाने की आती है, तब वह अपना रौद्र रूप धरते हैं, जिन्हें हम काल भैरव या भैरवनाथ कहते हैं। काशी में तो इन्हें “कोतवाल” माना जाता है, जिनके बिना परिंदा भी पर नहीं मार सकता।
महादेव की प्रिय राशियां
भगवान शिव की सबसे प्रिय राशियों में मुख्य रूप से वृषभ और मीन मानी जाती हैं, जिनके साथ मेष, मकर , कुंभ, कर्क और वृश्चिक भी शामिल है, क्योंकि इन राशियों के लोगों पर शिव जी की महान कृपा बनी रहती है और उनकी भक्ति, शांत स्वभाव या संघर्ष उन्हें महादेव के करीब लाती है
महादेव की सवारी
महादेव की सवारी नंदी बैल है, जो भक्ति, शक्ति और आनंद का प्रतीक माना जाता है। नदी को भगवान शिव का प्रमुख गढ़ और द्वारपाल भी माना जाता है, और शिव मंदिर में नंदी की पूजा के बिना भक्तों की भक्ति अधूरी मानी जाती है।
शिव पुराण के अनुसार, नंदी भगवान शिव के ही अंश या अवतार हैं, इसलिए उन्हें शिव का वाहन बनाया गया है।
महादेव के प्रसिद्ध मंदिर :
भगवान शिव के कई प्रसिद्ध मंदिर भारत में है, जिनमें 12 ज्योतिर्लिंग सबसे प्रमुख है, जैसे उज्जैन (महाकालेश्वर) , वाराणसी (काशी विश्वनाथ), गुजरात (सोमनाथ, नागेश्वर), उत्तराखंड (केदारनाथ) , महाराष्ट्र (त्र्यंबकेश्वर), और आंध्रप्रदेश (मल्लिकार्जुन) में स्थित मंदिर, जो देश भर में फैले हुवे है और हर शिव भक्त के लिए पूज्यनीय है।
मजेदार व भावपूर्ण बात:
सच कहूं तो, भगवान शिव जैसा “सरल और स्वभावपूर्ण” भगवान मिलना मुश्किल है। उनकी महिमा की सबसे मजेदार और प्यार बात यही है:
. कहीं भी मिल जाएंगे: उनके लिए कोई आलीशान बंगला या सोने का महल जरूरी नहीं है। गांव की किसी पगडंडी पर, पुराने बरगद, नीम या पीपल के पेड़ के नीचे या बस एक शांत कोने में एक पत्थर रख दो वही पर महादेव स्थापित हो जाते है।
. निराले नाम: शिव जी का नाम रखना दुनिया का सबसे आसान काम है। आपको बस अपनी भावना के आगे श्वर जोड़ना है।
. अगर आपको लगता है कि वो धूप में तप रहे है, तो तपेश्वर नाथ।
. अगर वे दया कर रहे है तो दयालुश्वर।
. यहां तक कि अगर आप उन्हें अपने गांव के तालाब के किनारे पंप के पास बैठा दे, तो वो खुशी खुशी पंपेश्वर भी बन जाते है
महादेव को दिखावा , छप्पन भोग, सोना चांदी व ताम झाम नहीं पसंद। उन्हें तो “भोलेनाथ” इसलिए कहते है क्योंकि वो भक्त की चतुराई नहीं, उसकी मासूमियत देखते है।
महादेव को प्रसन्न करने के लिए आपको कोई बड़ी डिग्री या संस्कृत का बहुत ज्ञान नहीं चाहिए , बस मन में छल कपट न हो और पुकार मन से सच्ची हो, तो वो एक लोटा जल में भी उतने ही खुश हो जाते है जितने किसी बड़े अभिषेक में।
निष्कर्ष
भगवान शिव सिर्फ भक्ति से प्रसन्न होने वाले देवता नहीं है, बल्कि मन से , सच्चे दिल से, नेक इंसान बनके , व सबसे पहले राष्ट्रप्रेमी बनने के बाद शिव जी प्रसन्न होते है। उनका कहना आप मेरे लिए कुछ न करो बल्कि सभी में प्रेम, भाव, भाईचारा तथा शांति स्थापित करो, और देश के विकास के लिए कठिन संघर्ष करो मैं उस कठिन मेहनत से प्रसन्न हो जाऊंगा।
और देश में सभी लोगों के प्रति सम्मान की भावना रखो, सभी धर्मों का सम्मान करो, सभी को एक जैसा मानो, शिक्षा का विस्तार करो, सभी को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करो मैं तुम्हारे प्रेम से प्रसन्न हो जाऊंगा और मेरी कृपा दृष्टि आप पर हमेशा बनी रहेगी।
सारांश
इस लेख में “महादेव” का वर्णन में से मुख्य बाते अर्पित है, जोकि इस लेख को बहुत ही प्रभावशाली, अद्भुत और महादेव के प्रति आकर्षित करने वाला लेख बन जाता है। इसको बहुत ही विस्तार व सरल शब्दों में बताया गया है।
















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